बीड़ी वाली लड़की

हर ज़ख्म कांटे नहीं देते, कुछ फूल भी ज़ख्म दे जाते हैं। बस ऐसा ही एक फूल थी वो।
मुझे हमेशा इस बात का दुःख रहेगा कि उसके होंठों को उसकी बीड़ी ने, मेरे होंठों से ज़यादा बार छुआ था। हाँ, वो बीड़ी पीती थी। थोड़ा अटपटा लगा ना? पर अगर आप उसे जानते, अच्छे से पहचानते तो आप ऐसा ना सोचते।
उसका नाम श्रध्दा था। इतना संस्कारी नाम ले कर, लड़की हो कर, बीड़ी पीना, कितनी बदचलन लड़की थी वो… आपको ऐसा ही लग रहा होगा। काश आप ज़िन्दगी को, दुखों को, वो 5-6 रुपये वाली बीड़ी को उसकी नज़र से देख पाते।
कैसे हम मिले, कैसे हम करीब आये, कैसे हमें, माफ़ी चाहता हूँ मुझे उस से प्यार हो गया, यह बातें सब बेतुकी हैं! असल में उसे कभी मुझसे प्यार नहीं था, उसे बस एक साथी चाहिए था जिससे वो बेझिझक बात कर सके, ऐसा कोई जो उसकी बीड़ी का धुंआ सोख सके, और मैंने वो काम किया।
उसके घर वाले शायद नहीं जानते थे उसकी इस खूबसूरत आदत के बारे में। उन्होंने उसे कोचिंग के लिए कोटा भेज दिया, उस टूटी रूह को भेज दिया, टूटे सपनों की नगरी में, जहाँ उसे अब कोई देखने वाला ना था, कोई नज़र रखने वाला ना था।
जब मैंने उसे पहली बार देखा था, तब मेरे मन में भी वैसे ही ख़्याल आए थे, जैसे आपके मन में आए थे जब आपको पता लगा कि वो बीड़ी पीती है। पर जो-जो उसके साथ हो चुका था ना, किसी और के साथ हुआ होता तो शायद खुदकुशी एक रास्ता होता।
कभी-कभी वो बीड़ी पीते-पीते मुंह से धुंआ नहीं छोड़ती थी, वो धुंआ इकट्ठा करके नाक से निकालती, और ऐसे दर्शाती जैसे बैल हो। हाथों से सींग बना कर मेरे ऊपर हमला भी करती, और उसके बाद खिलखिलाकर हँसती। बस यह सब देख मैं जान जाता कि ये वही हँसी है, जिसके लिए मुझे जीना है।
पर कभी-कभी वो हँसते हँसते एकदम खामोश हो जाती, बिल्कुल चुप, बिना किसी हाव-भाव के। यह वो वक्त होता था, जब उसका कमल सा चेहरा पत्थर सा लगता था, बिना जज़्बातों के. उस वक्त वो अपने माँ के पति के बारे में बताती, उसके बाप को तो वो खुद नहीं जानती थी, पर जिस व्यक्ति को दुनिया उसका बाप कहती थी, वो तो हरगिज़ बाप ना था. वो उसका बलात्कारी था, उसने कभी मुझे बताया नहीं, पर उसके हाव भाव से पता चल जाता था, उसके father’s name वाले खाने को खाली छोड़ने से पता चल जाता था, उसके बाप का काम-काज पूछने पर ‘दुःख देना’ का जवाब सुनने पर पता लग जाता था। पता नहीं उसके बाप ने उसके साथ क्या किया था, पर जो भी किया था, वो इतना भयंकर था कि ‘बाप’ शब्द सुन कर वो सिमट सी जाती थी, बिल्कुल सहम जाती थी। जैसे कोई कुत्ते का पिल्ला, मार खाने के डर से सहम जाता है। जैसे कोई खिला हुआ फूल, फिर से कली बन जाता है।
उसके शरीर में एक कम्पन छिड़ जाती थी, और आँखों में नमी आ जाती थी, और इस से पता लग ही जाता था कि जो भी उसके बाप ने किया था, उस से उसके ज़हन और जिस्म दोनों पर गहरी चोटें आई हैं।
अगर मैं कभी उस से उसकी बीड़ी के बारे में पूछता, तो वो कहती, “इसमें तो मेरा दिल बस्ता है, नहीं नहीं मेरे दिल के टुकड़े हैं ये, जिस दिन ये खत्म हो जाएँगे ना, उस दिन मैं भी खत्म हो जाऊँगी।”
एक बार मैंने उस से पूछा था, “किसने सिखाया तुम्हें बीड़ी पीना?” तो उसने कहा, “उसी ने जिसने मेरे दिल के इतने टुकड़े किये।” फिर उसने अपनी बीड़ी जलाई, और कहा, “देख! दिल जला कर जीती हूँ मैं, अपना दिल।”
आखिर के दो शब्द उसने धीमे स्वर में कहे थे, जैसे अपने आप को कह रही हो।
उसके कमरे में जब कभी जाओ तो किताबें खुली मिलती थीं, कोई बिस्तर पर, कोई फर्श पर, कोई मेज़ पर। मैंने कभी उस से पढ़ाई की बात नहीं की, पर मुझे इतना पता था, कि उसके भी सपने दफ़न हो गए थे टूटे सपनों की नगरी में आ कर, क्योंकि कई बार वो बीड़ी जलाते वक्त आग को घूरती थी, और कहती थी, “ये वही आग है जो मेरे सपनों को निगल गयी।”
एक बार मैंने उसके कमरे mein एक जला हुआ गोल लकड़ी का टुकड़ा देखा था, जो बांसुरी जैसा लग रहा था, पर मैंने कभी उससे उस बांसुरी के बारे में नहीं पूछा।
वो ऐसी ही थी, एक बार उसने जिसे छोड़ दिया, उसे फिर कभी नहीं पकड़ती थी। बस एक बीड़ी ही थी, जिसे वो हमेशा अपने करीब रखती थी। मैं उसके इतने करीब था, पर कभी उसकी खुद की खुशबू नहीं जान सका, उसमें से हमेशा बीड़ी की खुशबू आती थी। शायद यही थी उसकी खुद की खुशबू।
वो कभी-कभी खाँसती थी, बहुत ज़यादा खाँसती थी, साँस की दिक्कत थी उसे।
मैंने पूछा, “क्यों पीती हो इतनी ज़यादा बीड़ी? इसलिए कि तुम जल्दी मर जाओ?”
वो मुस्कुराते हुए बोली, “तुम ही हो यहाँ जो मुझे समझते हो, पर ये नहीं समझ पाए कि में साँस की आज़ादी कुर्बान कर रही हूँ, आज़ादी की सांस लेने के लिए।”
मैंने इसके बाद कभी भी उसके बीड़ी पीने पर ऐतराज़ नहीं किया।
सच कहूँ तो उसे कभी ढंग से समझ नहीं पाया, क्योंकि बीड़ी के धुएँ के कारण कभी उसे ढंग से देख ही नहीं पाया।
बड़ी बदनसीब रूह थी वो, पर जैसी भी थी, मुझे उस से इश्क था। बीड़ी जैसे धीरे-धीरे जलती है, वैसे ही हमारा कोटा रहने का समय जलता गया और फिर वो दिन आया जब वो वहाँ से जाने वाली थी।
उस दिन से पिछली रात उसने मुझे मिलने के लिए बुलाया, हम घंटों बैठे रहे, उसने मुझसे वादा किया कि वो मुझसे मिलने आएगी, और वो उसने झूठा वादा किया था, यह भी उसकी आँखों में साफ़ दिखाई दे रहा था।
“तुम्हारे साथ के लिए शुक्रिया, मैं यहाँ तुम्हारे बिना नहीं रह सकती थी,” इतना कहते ही उसने मेरे होंठों को चूमा, आखिरी बार।
उसके होंठों का स्वाद कसैला सा था, बीड़ी सा, बिलकुल भद्दा। उसने बताया था कि अगले दिन उसे लेने उस व्यक्ति ने आना है, जिसे दुनिया उसका बाप कहती है।
मैं उसे आखरी बार मिलने गया, तब उसके कमरे के पास काफी भीड़ थी। मैंने अन्दर घुस कर देखा तो एक आदमी, उसका बाप, पुलिस वालों को बता रहा था कि वो बीड़ी बहुत पीती थी, और शायद और भी नशे करती थी।
‘थी’ सुन में समझ गया कि क्या हो चुका है। और शायद मुझे पहले ही इसका अंदाज़ा लग गया था।
मैंने उन्हें नज़रअंदाज़ कर, नीचे फर्श पर पड़ी उसकी लाश को देखा। वो कुछ ही देर पहले ही मरी थी। अपने पिता के आने से कुछ देर पहले, अपने आप को उस दरिंदे के शिकंजे से बचाने के लिए उसने खुद का अंत खुद ही कर दिया था, और लोगों के हिसाब से उसका खूनी वो था, जिसकी गंध सारे कमरे में फैली हुई थी। उनके हिसाब से जो खूनी था, वो अभी भी फर्श पर पड़ा था, उसकी लाश के साथ, वो आधी पी हुई बीड़ी।
वो सब बीड़ी को दोष दे रहे थे, पर उस बदकिस्मत रूह को उन्होंने मारा था।
मैं चाह कर भी इस व्यंग्य पर हँस नहीं पाया।

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