बेरोज़गार आशिक़-2

मेक अप के नाम पे वो बस काजल ही लगाती थी! काजल की एक लेयर। मैं जब भी पूछता तो बोल देती “तुम तो मिल ही गए हो, मेकअप वेकअप की क्या ज़रूरत?” कठिन से कठिन उलझनों को भी आसान बना देती थी! उसके शहर का चक्कर उसकी नज़रों से लगाना भी एक डाईहार्ट टास्क हुआ करता था! तुम्हारा शहर मेरे लिए अजनबी ही रहा है! हाँ अब थोड़ा थोड़ा फ़मिलियर होने लगा हूँ पर अजनबी होना ज़्यादा ख़ास है, नज़रें भले ही मेरी हो पर नज़ारा तो तुम्हारी आँखों का होता है न!

तुम्हारे उसी बीकानेरी रेस्टरों की वही वाली सीट, जहाँ हम पहली बार डेट पे गए थे! पच्चीस साल की जिन्नगी में पहली बार डेट का मतलब तारीख़ से बदल कर किसी से मिलना हुआ था! तुम्हारी पसंदीदा कोल्ड कॉफ़ी विद आइसक्रीम और हमारा वही चिली पोटेटो! अब तो जैसे लगाव सा है उस जगह से! साला फ़िल्म देखने गए तो टिकट वाला भी दो बार कन्फ़र्म किया की “कॉर्नर सीट” या “सेंटर कॉर्नर सीट”? जवाब में हमने बोला “अमाँ पिक्चर देखना है यार! सेंटर कॉर्नर दो!” लड़का-लड़की थिएटर जाएँ तो टिकट वाला ख़ुद समझदारी दिखाते हुए “कॉर्नर टिकट” काट के दे ही देता है! थिएटर में जो वो दो मिनट के लिए तुमको गले से लगाया था न! हाँ बस वही! वहीं निपट गयी थी हमारी पिक्चर! हम ख़ुद हीरो थे और तुम हमारी हेरोईन और ये साली घड़ी की सुई हमारी कहानी का विलेन! तुम्हारे संग समय जितना जल्दी कटता है उतना ही धीरे तुम्हारे जाने के बाद! हिन्दी का सफ़र अंग्रेज़ी के suffer में बदल जाता है!

ये जो तुम मेरे हाथ को अपने सीने से चिपकाकर उसी में दुबुक जाती हो और नम आँखों से हमको एक टक़ देखती हो न! इसी में तो साला ज़िंदगी का मतलब समझ आजाता है! पहले किसी चीज़ को चाहो और फिर मिल जाने पर उसकी बेकदरी शुरू कर दो! पर ये जो मेरे हाथों का तुम्हारे सीने में लगकर उँगलियों पर तुम्हारे टपकते हुए आँसू का आना होता है दरसल यही वैल्यू बताते हैं! वैल्यू मेरे होने की! वैल्यू हमारे साथ की! वैल्यू के कोई इस क़दर भी चाह सकता है किसी को! ये जो तुम अपने दिल में सारा बवाला घोर के पी लेती हो और हमसे कुछ भी नही बताती ये तुमसे दूरी से ज़्यादा खटकती है हमको! कभी कभी बातें बोल देनी चाहिए! कभी कभी सब कुछ कह देना चाहिए! सब उगल देना चाहिए! क्या पता जो जो तुम जिससे कहना चाह रहे वो वही वही सुन ले!

तुम्हारे साथ रोटी बनाने का इक्स्पिरीयन्स किसी बच्चे की फ़ेवरेट टीचर के साथ टिचिंग जैसा था! जिस लड़के को बर्तन धुलने के अलावा और कुछ नही आया वो गोल रोटी बनाने लगे तो इसे आप इश्क़ का फ़ितूर ही कहेंगे! हालाँकि तुम्हारी रोटी हमसे ज़्यादा गोल थी पर मेरी वाली में प्यार ज़्यादा था!

लोगों की अपनी एक अलग दुनिया होती है! सबकी अलग! मेरी भी है! जब तुमको बाहों में भर लेता हूँ तो लगता है दुनिया में कितना सुकून है। जब तुम हँसती हो तो लगता है दुनिया में कितनी ख़ुशी है। रोती हो तो लगता है दुःख के पहाड़ से गुज़र रही दुनिया! जब किसी बात पे गुस्साती हो तो लगता है के नरक़ है ते दुनिया और जब चुपके से पीछे से आकर गले लग जाती हो तो लगता है कितनी रोमांटिक है ते दुनिया! तिरछी नज़र जब फेरती हो मुझपर तो दुनिया शक्की हो जाती है और जब हाथ थाम के बैठ जाती हो तो लगता है कितनी हेल्पिंग है ये दुनिया! होंठो को जो चूमू तो टेस्टी है ये दुनिया और आँसू जो निकले तो हाय! बेबस है ये दुनिया! तुमसे शुरू होती है और तुम पर ख़त्म! हाँ बस इतनी सी तो है मेरी दुनिया!

तुमको जो लिखना चाहूँ तो शब्द के अकाल से पड़ जाते हैं! तुम्हें पता है के तुम्हारे जाने के बाद कितना कुछ छूट जाता है मेरे पास? बिना तुम्हारे उसको सम्हाल पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है! तुम्हारी सीट तो कोई भी ले सकता है पर तुम्हारी जगह, वो बस तुम्हारी ही है!

कंधे पे तुम्हारी आँसू की बूँदों की गरमाहट अभी तक है! पीछे वाले कमरे में अभी तक लीची की ख़ुशबू से गमक रहा है! सुबह अब सर्द होना शुरू हो गयी है पर चद्दर के लिए लड़ने के लिए तुम नही हो! बाइक के बाएँ शीशे में अब देखना ही नही होता! कपड़ों के कॉम्बिनेशन का झंझट भी अब ख़त्म ही है! तुम नही होती हो तो भी सब तुम्हारा ही रहता है!

मैं आऊँगा! तुमको वापस ले आने, हमेशा के लिए! साथ चलने के लिए! ब्लू और पिंक के लिए झगड़ने के लिए! मरने के बाद फिर से जीने के लिए! हर रोज़ होली दिवाली सा जीने के लिए! तुम्हासे रूठने-मनाने के लिए! बेमतलब की बातों पर झगड़ने के लिए! रोटी बेलते हुए तुम्हें पीछे से पकड़ के तंग करने के लिए! तुम्हारे साथ उस छत की टैरस पे ढलता सूरज देखने के लिए! मैं आऊँगा! क्यूँकि जितना प्रेम मैं तुमसे करता हूँ उससे कहीं ज़्यादा प्रेम तुम अपनी आँखों के काजल के पीछे छुपा लेती हो!

Comments

comments

This post has been viewed 123 times

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *