हवा का झोंका

हवा का झोंका
डांगे चौक के बस स्टॉप पर देखा था उसे पहली बार, जब वो दौड़ती हुयी आ रही थी करीब सौ गज़ की दूरी से। उसके लहराते झूमते बाल, जिनकी लटें उसकी झील सी गहरी आँखों पर पड़ रही थीं और जिन्हें वो अपने कोमल हाथों से कान के पीछे सरका रही थी।

वो हाँफते हुए मेरे करीब आ खड़ी हुई थी और अपने नरम होठों को गोल कर थकान भरी साँसें छोड़ रही थी। वो हवा का झोंका मुझ तक पहुँचा तो मुझे एहसास हुआ कि इश्क़ की ठंडक क्या होती हैं।

मैं फूलों सा खिल उठा, पंछियों सा उड़ उठा और इश्क़ में झूम उठा। मैं अपने इश्क़ की दुनिया से निकल कर ज़मीन पर तब पंहुचा जब उसने मेरी तरफ देख कर पूछा-
“भाईसाहब, ये हिंजेवाड़ी के लिए जाने वाली बस निकल गयी क्या?”
पहली बार कोई लड़की मुझे पसंद आई थी और उसके मुंह से मेरे लिए निकला वो पहला लफ्ज़ सुन कर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकने ही वाली थी कि मैंने दिल पर हाथ रख कर जवाब दिया-
“जी नहीं मैडम, हिंजेवाड़ी की बस अभी आने ही वाली है और वैसे मेरा नाम ‘भाईसाहब’ नहीं, राज है।”
मेरा जवाब सुन कर वो मुस्कुराई और फिर हौले से उसका जवाब आया-
“माफ़ कीजियेगा, बचपन की आदत है भाईसाहब बोलने की। वैसे मेरा भी नाम मैडम नहीं, मेघा है।”
उसका जवाब सुन कर मेरे पैरों तले जो ज़मीन खिसकी थी वो वापस आ चुकी थी। फिर क्या था, उससे बातें करते हुए मैं उसके साथ बस में चढ़ गया।

जाना तो मुझे कहीं और था पर उसके साथ वक़्त गुज़ारने के लिए हिंजेवाड़ी तक जा पहुँचा। ये सफ़र इश्क़ की गलियों से गुज़र कर निकला जिसकी चकाचौंध ने हमारे दिल के सारे दरवाज़े खोल दिए थे।

उस सफ़र के जब आज करीब 10 साल पूरे होने को हैं तो मैं सोचता हूँ कि वो इश्क़ मुकम्मल होता ही नहीं अगर उस शाम बस स्टॉप में मैं उसे पलट कर ना देखता, वो इश्क़ आखिर इश्क़ होता ही नहीं अगर वो मेरा जवाब सुन कर मुस्कुराती नहीं। उस डांगे चौक से पकड़ी बस ने मुझे अपना जीवन-साथी दे दिया जिसने मेरे ज़िन्दगी में चटकीले रंग भर दिए।

मैं उस पहली मुलाकात के बारे में सोच ही रहा था कि मेघा ने अपने नरम होंठों को गोल कर साँस फूँकी और वो हवा का झोंका मेरे दिल को फिर से छू गया।

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