आकांक्षा | The Desire

आकांक्षा

लंबी सी गाड़ी से उतरा आदमी उदास तो बिल्कुल भी नहीं था । लेकिन उसके मुखमंडल पर सूखे आंसू और होठों की मुस्कान से खुश दिखाई दे रहा था । वो चुपचाप भिखारी के बोरे पर बिल्कुल उससे सट कर बैठ गया ।

 

 

भिखारी ने बीड़ी सुलगाई तो उसने हाथ बढ़ा दिया । भिखारी ने हाथ खिंच लिए ” आखिरी है । ”
उसने अल्ट्रा माइल्ड का पैकेट भिखारी के कटोरे में रख दिया और उससे बीड़ी लेकर घुंआ खींचने लगा ।

 

 

कश खींचते हुए बड़बड़ाया ” झन्नाटेदार है कहां से लाये । ”
भिखारी हँसा ” कोई दिन में चढ़ा गया था पुड़िया महादेव पर , शाम में पुजारी ने उठाकर दे दिया । ”

 

धुआं असर कर रहा था , उसने शून्य में ताकते हुए पूछा ” बाहर ही सोते हो या छत के नीचे सोने देता है पुजारी”

 

भिखारी ने जबाब नहीं दिया । चुपचाप हाथ बढ़ा दिया ।
बीड़ी उसको देते हुए उसने फिर पूछा ” दुख का कारण क्या है ?”
कश खींचकर धुएं का बादल बनाते हुए भिखारी फुसफुसाया ” आकांक्षा । ”

 

उत्सुक होकर उसने बीड़ी के लिए हाथ बढ़ाया ” निवारण क्या है दुख का ?”

भिखारी ने बीड़ी जमीन पर रगड़कर बुझाते हुए कहा ” संतोष । ”

 

” तुम मुझे जानते हो ?”, वो व्यग्र हो उठा ।
” नहीं “, वो मुस्कुराया ।
” तो फिर तुम मेरे बीबी बच्चों के नाम कैसे जानते हो “, उसने आश्चर्य से आखें फैलाई ।

 

भिखारी ठठाकर हँस पड़ा ” पुराना बीमार आधा डॉक्टर तो हो ही जाता है ।”

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