हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते | I don’t know how much I love you

आशा ने दरवाज़ा खटखटाया। एक बार घंटी बजाई। दो बार घंटी बजाई। परंतु किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। “ओह, मैं भी कितनी बड़ी मूर्ख हूँ। आज तो रविवार है। मुमकिन है भाभी अभी तक सो रही हों” उसने अपने आप से कहा। वो वापस लौटने के लिए मुड़ ही रही थी की सहसा दरवाज़ा खुला।
“माफ़ कीजियेगा भाभी, मैंने सुबह सुबह आपकी नींद खराब कर दी। दरअसल, मुझे ना एक बोतल ठंडा पानी चाहिए” आशा ने कहा।
“माफ़ कीजियेगा । मेरा फ्रिज दो दिनों से खराब है” श्रुति ने कहा।
“कोई बात नहीं भाभी”। रोहित भाईसाहब कहाँ हैं?”
“वो तो अपने ऑफिस के काम से एक हफ़्ते के लिए बाहर गए हुए हैं”
“ओह। भाभी, अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो हमें याद ज़रूर कीजियेगा। अच्छा, चलती हूँ। नमस्ते”।
श्रुति ने दरवाज़ा बंद कर दिया। उसने अपने माथे से पसीना पोछा और किचन में चली गयी। उसे मेज़ पर एक ख़त दिखाई दिया। उसने उस ख़त को पढ़ना आरम्भ किया।
“प्यारी श्रुति,
आज वैलंटाइंस डे है। तुमसे दूर होकर मैं तुम्हारी अहमियत को समझ पाया हूँ श्रुति। मैं तो किसी बंजारे की तरह दर दर की ठोकरें खा रहा था, हक़ीक़त तो यही है कि तुम्हारी बेइंतेहा मोहब्बत ने ही मेरी ज़िन्दगी को फिर से शादाब बनाया है। तुम्हारी मोहब्बत ही मेरी ज़िन्दगी का हासिल है। मेरी हस्ती के हर सुतून पर सिर्फ तुम्हारा ही पहरा है श्रुति। मेरी हर सांस में तुम्हारा वजूद शामिल है। अगर तुम चली गयी, तो मैं बिल्कुल किसी रेत के महल की भाँति टूट जाऊंगा। बिखर जाऊंगा।
जानती हो, जब कोई और तुम्हें मोहब्बत भरी निगाहों से देखता था, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी ने मेरे सीने में खंजर उतार दिया हो। दिल तो करता था, कीे मैं उसी वक़्त उस शख़्स की उन गुस्ताख़ आँखों को नोंच डालूं जिन्होंने तुम्हें इस तरह देखने की जुर्रत की। तुम्हें आकाश याद है? हाँ वही, जो हर क्षण तुम्हारे आगे पीछे भाभी भाभी की रट लगाता रहता था। जानती हो मैंने उसके साथ क्या किया? उसे खून से बड़ा डर लगता है। मैंने उसकी नस काट दी। धीरे धीरे, हौले हौले, मृत्यु ने उसे अपनी आग़ोश में समेट लिया। नहीं नहीं – मैंने उसका क़त्ल नही किया। मृत्यु तो शरीर की होती है। आत्मा तो अमर है, नित्य है, अविकारी है।
सब तुम्हारी ग़लती है। तुम्हें समझना चाहिए था, की तुम्हारी रूह, तुम्हारी हंसी, तुम्हारी हर एक मुस्कुराहट पर सिर्फ मेरा हक़ है। फिर क्यों तुम शर्मा जी के बच्चे के साथ हंसती खेलती रहती थी? तुम्हारे गुनाहों की सज़ा उस मासूम को भुगतनी पड़ी। बेचारे को मुझे ज़मीन में ज़िंदा दफ़न करना पड़ा। तकलीफ तो हुई, पर तुम्हारी मोहब्बत के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। मैंने उसका क़त्ल तो नहीं किया श्रुति। मृत्यु तो शरीर की होती है। आत्मा तो अमर है, नित्य है, अविकारी है।
जानती हो मैं तुम्हें इस घर में क़ैद क्यों रखता था? मैं डरता था, कि घर से बाहर की धूल तुम्हें कोई नुकसान ना पहुंचा दे। मैं डरता था, कि अगर किसी और ने तुम्हारी ये दिलकश अदाएँ देख ली, तो मेरा क्या होगा।
अगर तुम चली गयी, तो मेरी तो जान ही निकल जायेगी। मैं क़सम खाता हूँ, की जो भी मेरे और तुम्हारे दरम्यान आने की कोशिश करेगा, में उसी वक़्त उसे यमलोक पहुंचा दूंगा। तुम सिर्फ मेरी हो श्रुति, सिर्फ मेरी। इस जहाँ में भी और अगले जहाँ में भी। यहाँ क़ैद रहना तुम्हारा मुक़द्दर है। तुम तो जानती हो ना- मैं तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ। केवल एक बात का स्मरण रखना- मृत्यु केवल शरीर की होती है। आत्मा तो अमर है, नित्य है, अविकारी है। शस्त्र उसे काट नहीं सकता, वायु उसे सुखा नहीं सकती, जल उसे भिगो नहीं सकता और अग्नि उसे जला नहीं सकती।
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा
रोहित”
श्रुति को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने जल्दी से अपने फ्रिज का दरवाज़ा खोला। रोहित की लाश अभी भी वहीं पड़ी हुई थी। वो भी बेचारी क्या करती। रोहित के जुनून और पागलपन ने उसे ऐसा क़दम उठाने के लिए मजबूर कर दिया था। परंतु ये पत्र?
सहसा, पूरे घर में एक आवाज़ गूंजने लगी
“हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नही जानते,
मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना”
मृत्यु केवल शरीर की होती है।
आत्मा तो अमर है।
नित्य है।
अविकारी है।
रोहित की आत्मा ने श्रुति को हमेशा के लिए उस घर में क़ैद कर लिया। आज भी श्रुति की दर्द भारी सदायें, मदद की गुहार लगाती हैं। परंतु उन्हें सुनने वाला कोई भी नहीं। बीस साल बाद भी, उस घर से केवल एक ही आवाज़ सुनाई देती है-
“हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नही जानते,
मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना”

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