जब हम बुढे़ हो जायेंगे

जब मैं साठ पार कर

सठिया जाऊँगा

और तुम हो जाओगी

बासठ की बुढ़िया खूसट

जब उम्मीदों को ढोते ढोते

कंधे हमारे झुक जाएँगे

और कुछ पुर्जे जिस्म के

थक हारकर रूक जाएँगे

जब हम सुबह सवेरे प्राणायाम करेंगे

पार्क की बेंच पर बैठे सुबह को शाम करेंगे

जब हम ‘हाहाहा’ कर नकली ठहाके लगाएँगे

फिर भी बढ़ी हुई ‘बीपी’ कंट्रोल नहीं कर पाएँगे

जब छल चुके होंगे हमें सब नाते खोटे

जब लगने लगेंगे सारे सुख मायावी, झूठे

उस समय भी ओ खूसट बुढ़िया

मेरे लिए रहोगी तुम जादुई गुड़िया


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