सपने(dream) तो देखे होंगे न? कोई लिमिट है सपनों की?कोई ओर छोर?

दरसल ये सपने(dream) ही तो होते हैं जिनको देख के हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है! अनवरत! बचपन में न हमें क्रिक्केटर बन्ने का बड़ा शौक़ था, सचिन जैसा! आज भी दिल सचिन ही है हमारा! पर वो क्या है के 90s की जेनेरेशन में हिंदुस्तान का हर देसी लौंडा दिन में सचिन और रात में गोविन्दा ही बनता था! वो सचिन का स्ट्रेट ड्राइव हो, पुल हुक या प्लेस हो, दिल तो वहीं थमता था! मम्मी आज भी झोंके में कभी कभी पूछ ही लेती हैं के “सचिन ने कितना बनाया?” ख़ैर बचपन जैसे जैसे बीतता गया सपने भी बदलते गए!
कभी लिमिट में सपना देखे हैं? कुछ ऐसे जैसे जेब में पैसे न हो और मन हो थिएटर में फ़िल्म देखने का या किसी बढ़िया होटल में कुछ खाने का! उस वक़्त जो ये सोचते फिरते हैं न के कहीं मिल जाए रास्ते में ५०० का गिरा एक नोट और पूरे हो जाएँ वो उस दिन के सपने! बस वही होते हैं लिमिटेड सपने! जैसे कटरीना संग नाच रही उस ख़ूबसूरत डांसर संग घर बसाने के सपने देखना क्यूँकि आपको बख़ूबी मालूम है के आप कटरीना को शायद डिसर्व भी करतें हो पर कटरीना आपको घंटा डिसर्व नही करती! वैसे सपने लिमिटेड हो जाएँ तो सब कुछ सम्भव लगता है पर यहाँ तो साला सबको रजनीकांत बनना है!
बचपन में स्कूल में घंटी बजाने का शौक़ था तो चपरासी बनने का सोचा, घर पे दरवाज़ा और खिड़कियाँ बन रही थी तो औज़ारों को देख के बढ़ई बन्ने की ठानी! 6-7 साल की उम्र में आई॰ए॰एस॰/पी॰सी॰एस॰ न बोलते बनता था और न सुनने में अच्छा लगता था! स्कूल रिक्शे से जाते थे तो रिक्सावान बन्ने का शौक़ चढ़ा था! मज़ा आती थी! शायद स्कूल में कम और रास्ते में रिक्शा ठेलने में ज़्यादा ही मज़ा आती है! हिंदी फ़िल्में बहुत देखते थे दूरदर्शन पर, उस दौर में याददाश्त भी ज़बर हुआ करती थी! ये कुलि नम्बर १, आंटी नम्बर १, हीरो नम्बर १ में गोविन्दा को देख देख के ही क्लास की सबसे प्यारी लड़की से इश्क़ हो गया! प्यारी का पैमाना ये था के कुछ लड़कियाँ जहाँ चोटी बाँध के आती थी तो कुछ हेयरबैंड पर उसके ब्वायकट हुआ करते थे, हमारे जैसे और माँग भी उलटी काढ़ती थी!
थोड़ा बड़े हुए तो डाक्टर बनने का सपना देखा! एक बार चोटा गए थे। पापा डक्टरवा के पास ले गए तो वहाँ दो ठु सुई लगी और 7 टाँके! घर आकर सोचा के साला ये सब कैसे सिल देते हैं ज़िंदा लोगों को! उसी दिन से डाक्टर बन्ने का ख़्वाब डाउन होता चला गया! डाक्टर न बन पाने का एक बड़ा रीज़न ये भी था के हमें bio वाली मैम पे क्रश गिरा तो bio कभी याद भी नही हुई! माइटोकांडरिया पावर हाउस था ये रटे थे! और 6ठीं में पता चला के दिल का शेप दरसल इमोजी वाला नही होता है! वो सब फ़िल्मी होता है!
अपने जन्मदिन पे स्कूल में टॉफ़ी बाटने को ख़रीदते थे! उसके ठीक एक रात पहले खुली आँखों से सपने देखते थे के अपने दोस्त और फ़ेवरेट टीचर को २ टॉफ़ी देंगे! जन्मदिन पर फ़ॉर्मल ड्रेस पहिन के जाना अलाउ था तो मम्मी के द्वारा दिलाई गयी वो नान डेनिम पैंट और फुल्ल टीशर्त में ख़ुद को सलमान ही समझते थे! समय बीतता गया और आँखें खुलती गयी पर सच तो ये है आज तक नही खुली! साइकिल से स्कूल जाने का सपना भी सातवीं में पूरा हुआ! ख़ुद को स्कूल ड्रेस पहन के साइकिल पे देखना बड़ा ठंडा(cool) लगता था!
इंटर करते करते ख़ुद में एंजिनियर को ढूँढने लगे! गणित ठीक ठाक हो गयी थी और शर्मा जी का लौंडा भी इंजीनियरिंग करके विदेश(नेपाल) में सेटेल ही था तो सोचे हम भी हो लेते हैं! वैसे भी पढ़ाई में एक इंजीनियरिंग ही एक ऐसा कोर्स है जिसमें आप इंजीनियर छोड़कर सब कुछ बन जाते हैं! हमसे तो वो भी नही हुआ! ऐसे ही कई सपने देखे हैं हम सब ने, मेरे अंदर का सचिन अभी तक ज़िंदा है! आज भी शीशे के सामने झाड़ू लेके पुल और हुक मार दिया करते हैं अकेले और उठा के झाड़ू दर्शकों(बेड,tv,फ़्रिज आदि) का अभिवादन स्वीकार कर लेते हैं! आज भी ज़िंदा है वो गोविन्दा जो भाई की बारात में निकलता है और भीड़ में भी ख़ुद को अलग ही साबित करता है! आज भी मन होता है के स्कूल में जाके घंटी बजा दें या किसी की खिड़की दरवाज़े का साइज़ परफ़ेक्ट कर दें! जी चाहता है फिर से तैयार हो जाएँ टाई-बेल्ट लगा के और निकल जाएँ स्कूल! खिला दे उस ब्वायकट बाल वाली लड़की को अपनी टिफ़िन का पराँठा-भुजिया और देदे अपने दोस्त को वो सारी टोफ़्फ़िया!
हमें सपने आज भी उतना ही पसंद है जितना बचपन में थी! अब भी कभी डाक्टर बनने को जी चाहता है तो कभी इंजीनियर बन्ने को! इन्स्पेक्टर बनके बोलें “हैंडसप! पुलिस तुमको चारो तरफ़ से घेर लिया है! अपने अपने हथियार नीचे रख दो!” तो कभी फ़ौजी बनने को! मन आज भी भटकता है! कभी बन जाए लेखक तो कभी हलवाई, कभी जज तो कभी मोची! कभी दर्ज़ी तो कभी “हर एक माल १०₹” में बेचने वाला फेरी वाला! जो है अब वो है नही, जो चला गया वो कभी था ही नहीं! क्या पता कितने सपने बदलेंगे, क्या पता कितने सपने टूटेंगे! अगर कोई एक सपने के पीछे भागना हुआ तो हमेशा अपने पापा जैसा बना चाहेंगे! हमेशा!
मुमकिन तो नहीं है हर सपने को पूरा करना पर आसान ये भी नहीं के इश्क़ में शेखचिल्ली हो जाना! हर सपने के पीछे भागेंगे तो ज़िंदगी ही सपना हो जाएगी! और मज़ा? मज़ा तो तब है जब सपना टूटता जाए और हर बार मुस्कुरा के बोलें “सपने और वादे टूटने के लिए ही बनें हैं!”

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