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Ek gufa thi kali :obsession

Ek gufa thi kali :obsession

एक गुफा थी काली। गुप्प घना अँधेरा। मैं टोता रहा अपने ही हाथ। मैं पकड़ता रहा अँधेरे की उंगलियां। मेरी पल्खें लड़कर चोट खाती रहीं आपस में। एक उम्र तलक बैठा रहा। मगर कब तक। तभी ऊपर से एक रोशनी गिरी। मैंने उसकी आग में एक-एक करके अपने बाल जलाये। फिर नाखून और उंगलियां। आँसुवों का तेल बनाया। खाल खींच दी, पीठ की हड्डी में लपेटा और मशाल बना कर घुटनों के बल रेंगने लगा। कुछ दूर लेकर चला तो खालीपन और अवसाद के घिनौने चमगादड़ मेरे मुंह से लड़े। मैं चलता रहा। ज़मीन की कीच चिपकती रही पैरों की उंगलियों से। पिस्सू, जंगली तिलचट्टे, काली छिपकलियां, कीड़े कुचलते रहे। उबकाई आती रही, फिसलता रहा अपनी ही उल्टियों पर।

मगर चलता रहा अनवरत। मुझे चूमना था रोशनी का सीना।मुझे था यकीन कि उस पार उजला रस्ता खुलेगा। खुलेगा ज़रूर। कलाई पर वक़्त नहीं बँधा था, तो वक़्त की कलाई पर नब्ज़ सुनी। “मैं नहीं बचूंगा ज़्यादा देर”। वक़्त ने कहा।    खाल पूरी जल चुकी थी, हड्डी पिघल रही थी। उम्मीद लौ सी थी। लौ में कोई उम्मीद न बची थी।अँधेरा हँसते हुए मेरे कंधे पर फिर से चढ़ रहा था। पर जलवा हुआ, देखा तो कोई था सामने, हजारो सूरज अपने सीने में भरे, करोड़ों चाँद दो आँखों में कैद किये। उसकी आँखों से उल्काएं बह रही थी। उसके लबों से सय्यारे फूट रहे थे। उसने रोशनी पहन रखी थी जिस्म पर। या रोशनी ने लपेट रखा था उसे। वो यूं खड़ी थी जैसे कोई खुदा खड़ा होता होगा मोजसा दिखलाने को।

उसके चेहरे पर भाव की एक लकीर भी न थी। वो खुद में पूर्ण थी। उसमे देने को बहुत कुछ था।माँगने को गुंजाइश भी नहीं। उसके एक चेहरे में करोड़ों चेहरे थे। उन चेहरों में किसी की आँख तुम जैसी थी। किसी में होठ, किसी में कान। तुम जैसी पूरी कोई नहीं थी।उसने इशारा करके बुलाया मुझे, हाथ बढ़ाया, मेरी मशाल लेली, और फेंक दी किनारे पर। मैं बुत सा देखता रहा। मशाल गिरती गई, गिरती गई खलाओं में। उस बुझती रोशनी के नूर में देखा मैंने तो नीचे उस गुप्प अँधेरे में कई सारे ‘मैं’ थे। जो किनारे बैठे अपनी खाल और हड्डियों से मशाल बना रहे हैं। कुछ रेंग रहे हैं, कुछ रो रहे हैं। मशाल गिरी नीचे तो वो सारे चेहरे अचानक से मुझे देखने लगे और बेतहाशा अपने हाथ पैर हिलाकर कुछ इशारा करने लगे।

इससे पहले की मैं उन्हें कुछ कह पाता वो मशाल बुझ चुकी थी।अँधेरा बिलकुल पहले जैसा हो चूका था। मैं यूँही खड़ा रहा बहुत देर। फिर ऊपर से एक मशाल गिरी मेरे बगल में, मैंने ऊपर देखा था बिलकुल मेरे चेहरे का एक आदमी खड़ा था। मैंने ज़ोर ज़ोर से हाथ हिलाकर उसे समझाने की कोशिश की, कि “लौट जाओ।” पर वो बुत बना मुझे देखता रहा।पास पड़ी मशाल बुझ चुकी थी। अँधेरा हंस रहा था।कुछ काली ठंडी उँगलियों ने मुझे सीने से जकड़ा और कान में कहा
“ये खेल बहुत लंबा चलने वाला है।”



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