midnight special(स्मोकर की कलम से)

एक हाथ में किताब है, दूसरे में फ़ोन। अभी-अभी सिगरेट बुझाई है। सोचा कि कुछ लिखूँ। कितना मुश्किल होता है सच को सच की तरह लिखना। हम जो किताबें पढ़ते हैं, उनमे कितना सच है। सोचो तो सर दुखने लगता है। जो ये पढ़ रहा है उसे कितना सच लगेगा इसमें? किसी ने किताबों से ऊँघ कर फेसबुक खोला है, तो कोई किसी का फ़ोन नॉट रिचेबल होने कि वजह से। थोड़ा सा वक़्त खुद से चुराकर पढ़ रहा है कोई इसे, तो कोई खुद को धोखा देकर।

ये रात होते ही तकलीफ बढ़ क्यों जाती है। शायद शोर नहीं होता तो ज़हन की आवाज़ चीख जैसी लगती हैं। इसीलिए लिख रहा हूँ। जब सिगरेट सर पे चढ़ती है तो कल्पनाएं नीचे उतरती हैं और लिख देते हैं। किताब भी हम अपनी कल्पनाओं से प्रेरित होकर चुनते हैं, या सही कहूँ तो उनसे मजबूर होकर। वही पढ़ते हैं, जो ज़हन पढ़ना चाहता है। फिर सब कुछ सच क्यूँ नहीं लगता। क्यूँ शक होता है अपनी ही कही हर बात पर? शायद इसलिए कि मन झूठ ही सुनकर खुश है।

एक सिगरेट और दूसरी सिगरेट के बीच का जो फासला है, इसे ही मैंने कल्पना कहा है। बल्ब की रौशनी भी सूरज की तरह चमकती है और सुई गिरने की आवाज़ मानो किसी पुरानी फैक्ट्री में लगी पुरानी मशीनों की तरह, जिनमें जंग लग गया है। सब रो रहे हैं, सब। सब मंडरा रहे हैं इन्हीं फेसबुक इंस्टा के गलियारों में, किसी ऐसे झूठ की तलाश में जो उनके मन को सुकून दे दे। पर मिलता नहीं। पर भटकना है, सारी रात। यूँही बेवजह!
मध्यरात्रि स्पेशल

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