लड़की का दर्द

पता नहीं प्रॉब्लम क्या है..चार साल पहले तक लड़का थी यार! टोटल लौंडा खुश था बस एक चीज़ अन्दर थी हमेशा से लड़कियों वाली, वो था प्यार में विश्वास..वो कहते हैं न ‘डाई हार्ड रोमांटिक’..साली कतई चूतिया चीज़ है प्यार..प्यार जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं शायद..बस इमेजिनेशन ही है एक..हाँ सेक्स और फिजिकल अट्रैक्शन बहुत दिखा..अब तो इतना देख चुकी हूँ इस ‘फिजिकल लस्ट’ को कि साला सबकी नज़र में बस वही दिखती है..डर गयी हूँ मैं पूरी मर्द प्रजाति से..किसी को ज़रूरत है, किसी से कण्ट्रोल नहीं होता, किसी को मैं ही ठरकी लग जाती हूँ, किसी को करैक्टरलेस भी लगती होंगी शायद..पता नहीं कुछ कह नहीं सकती बड़ी जजमेंटल है दुनिया..

पर कर्म होते हैं न भैया..कर्म के हिसाब से मिलता है सब..मुझे कर्म के हिसाब से मिली इतनी वासना भरी आँखें मिली हैं..घर के बाहर तो मिलती ही थीं, अब तो घर के अन्दर भी मिल चुकी हैं..जी करता है ऑपरेशन करा के लौंडा ही हो जाऊं..हद कर रखी है दुनिया ने..जिससे तमीज से पेश आओ वही बदतमीजी करता है..रिश्ता चाहे कोई भी हो, आँखों में सब के वासना ही होती है..प्यार में भी वही दिखा..आज तक समझ नहीं आता कि रात होने के बाद बिस्तर पर मुझे इंसान की जगह सामान क्यूँ समझा गया..शायद इसलिए क्यूंकि मैंने खुद को सामान बना कर ही छोड़ दिया था..

बीती बात को याद करना कोई न भी चाहे मगर जो आज घर के अन्दर रिश्ते की हदें टूटी हैं, उससे सारे ग़म ताज़ा हो गए हैं..अब मर्द अगर कहे न कि ‘सारे मर्द एक जैसे नहीं होते’ तो हंसी आएगी बस..फॉरएवर अलोन जैसा जीना भी सही था मगर अब चाह कर भी किसी मर्द पर भरोसा नहीं हो पायेगा..दुखद ये है कि फेमिनिज्म का टैग लगा कर घूमना पड़ेगा लेकिन अगर फिर भी अपनी आबरू बची रह जाए तो ये मर्दों के दिए किसी तोहफे से बड़ा नहीं होगा..

मध्यरात्रि स्पेशल

 

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