Ideal ishq se actual tak


बदलने को बहुत कुछ बदल चूका हैं। हमारे बिच होने वाली

बातें बदल चुकी हैं। कब हम घुमा फिराकर बातें करते करते,

इतने ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड हो गये, मालूम तक नही चला। पता

हैं, अब तुम मुझे बहुत साधारण सी लगने लगी

हो। अब मुझे तुम्हारी बातों में कोई जादू सा महसूस

नही होता हैं। ना ही मुझे लगता हैं,

की तुमसे बात नहीं करने पर मेरी जान

चली जायेगी। ना ही किसी

से जलन और ना ही तुम्हे खो देने का ख्याल आता हैं। ना तो

अब रात भर छत पर बैठकर पुरानी बातें सोचने का मन करता हैं

और ना ही तुम्हे स्पेशल फील करवाने को

तुम्हारे लिए कुछ लिखने की फुर्सत मिलती हैं।

अब इतना कुछ बदल चूका हैं की मुझे अब

तुम्हारी फिजूल की बातों पर प्यार भी

नही आता। फेसबुक पर प्यार पे लिखी कहानियाँ को

देखते ही नजर चुरा लेता हूँ। वाकई कितना कुछ बदल चूका हैं

न।

लेकिन इन सब बदली हुई आदतों में कुछ बातें आज

भी नही बदली हैं। दिनभर होने

वाली अनाब सनाब बातें भले ही गुड मोर्निंग-गुड

नाईट के बिच सिमट चुकी हो, पर एक रोज जब तुम्हारा कोई

मेसेज नही मिला तो महसूस हुआ की महसूस

होना बंद नही हुआ हैं। आज भी सुबह

की शुरुआत और दिन के अंत में तुम ना मिलो तो फिर वक्त

निकालना मुश्किल होता हैं। आज भी मेरी मंजिल तुम

ही हो। आज भी तुमसे शिकायतें और झगड़े करना

बंद नही हुआ हैं, आज भी मुझे

तुम्हारी हँसी जूही चावला

जैसी ही लगती हैं। भले

ही अब तुम मुझे साधारण सी लगने

लगी हो। लेकिन आज भी मैं कैलेंडर में छुट्टियाँ

तलाशता हूँ और सपने बुनता हूँ, ताकि उस साधरण सी शक्ल को

अपनी आँखों में भर सकूँ।

यकीनन बहुत कुछ हैं जो बदल चूका हैं। आइडियल सिचुएशन

एक्चुअल हो गई हैं। वैसे भी आइडियल तो कुछ होता

ही नही। फिर भी हमे

वोही पढ़ाया जाता हैं। वैसे ही आइडियल इश्क

भी पॉसिबल नही हैं, हम सोचते हैं

की वैसा होगा पर असल में इश्क अपने रूप बदलते रहता हैं।

इश्क पागलपन से शुरू होकर जिम्मेदारी तक इश्क

ही रहता हैं।

सब बदलने के बावजूद भी मैं खुद को इश्क में ही

समझता हूँ और समझता ही रहूँगा। मेरा इश्क बदला तो इश्क

की डेफिनेशन भी बदलती

रहेगी। जैसे पहले आइडियल इश्क था और अब एक्चुअल

इश्क।

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