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Diwali

हमें अच्छे से याद है के बचपन में पापा के साथ दिवाली के
ठीक पिछली शाम को बहन के साथ पटाखे ख़रीदने
रामलीला मैदान जाते थे! हमें बंदूक़ों(चुटपुटिया वाली) का
बड़ा शौक़ हुआ करता था! पापा हमेशा छुरछुरियाँ, जलेबी
(चकरघिन्नी) अनार और चुटपुटिया ख़रीदने पर ही ज़ोर देते
थे! बम से थोड़ा परहेज़ था उन्हें! डरते थे हम लोगों के लिए!
आज भी दिवाली पे रात में हड़का ही देते हैं! रोकेट उड़ाने के
लिए रूहअफ़ज़ा(बीयर, शराब से घोर परहेज़) की सीसी का
उपयोग किया करते थे! मोहल्ले में एक लौंडा ज़रूर ऐसा होता
है जो लगभग हर घर में छुछूवा के सबके साथ पटाखे जलाता है!
हमारे मोहल्ले में वो हमारा छोटक़ा भाई हुआ करता था!
पटाखे लाने के बाद बग़ल वाले पड़ोसी और परम मित्र बड़े
दद्दा(पिंटु ) से ये डिस्क्स हुआ करता था के कौन सा
पटाखा आया और कौन कौन सा रह गया! फिर बम का
शौक़ चर्राता था और हम लोग घर पैसा चुरा चुरा के और कुछ
मम्मी से चुपके से माँग कर बमों की हवस को पूरा करने
रामलीला मैदान निकल जाया करते थे! पटकउवा बम और टू
साउंड बम हम लोगों का फ़ेवरेट हुआ करता था! उसे पापा
की अनुपस्थिति में फोड़ा जाता था! सारी शोपिंग के
बाद बंटी (हमारा कजन) से मिलना होता था! और पड़ाकों
पर दोबारा चर्चा चालू होती थी!
दिवाली की शाम का इंतज़ार हुआ करता था! तब झालर
लाइट से ज़्यादा मोमबत्ती जलाने का क्रेज़ हुआ करता था!
मोमबत्ती मिर्ची जलाने के काम आया करती थी! मुर्ग़ा
छाप पटाखा हमारे बनारस में बड़ा फ़ेमस था! चुटपुटिया
वाली बंदूक़ पकड़ कर अक्सर हम लोग पुलिस-चोर और “सुराग़”
के अभिनेता बन जाते थे!
हमें ये स्वीकार करने में कोई दिक़्क़त नही के अगले दिन
मिर्ची बम दोबारा बीन(अपने घर के ही) के धूप में सूखा के
शाम को और ज़ोर से दग़ाते थे! और फिर एकादशी को
दरिद्दर भगा के गन्ना चुहते(चूसते) थे!
दिवाली आज भी मनाते हैं! बस उत्साह बच्चों वाला नही
रह गया! हमने बचपन को जिया है! हुमक के जिया है! 90s के
सभी लौंडे जिए हैं! आज की जेनेरेशन को भी जीने दीजिए!
रोकिए मत! इनका बचपन बचा लीजिए, प्रदूषण दो-चार दिन
साइकिल से चलाकर बचा लीजिएगा! चलते हैं! छोटूवा बहुत
पड़ाका लुक़वा के रखा है! बिना हमारे दग़ायेगा नही! बहुत
प्यार करता हैं हमसे!
और आप सभी को दिवाली ढेरों शुभकामनाएँ!
जय श्री राम!
जय श्री कृष्णा



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