Propose day | बाल प्रेम

गुलाब किसी का कोई और खेल गया! उदास मन लेकर प्रवीन घर को लौटा और अर्पित ने भी सांत्वना देने में कोई कसर नही छोड़ी! नाइनटीज की दोस्ती और प्रेम दोनो ही शर्मिले और रसीले होते थे! रात कैसे गुज़री ये तो बस प्रवीन ही जानता था! उधर अर्पित भी अपने दोस्त की हालत देख के उसको अलग अलग आइडियाज सूझ रहे थे लेकिन हर आइडिया के अंत में उसको प्रवीन की कुटाई ही नज़र आरही थी!
सुबह हुई और प्रवीन घर से जल्दी निकल के अर्पित के घर पहुँचा! अर्पित भी फट्ट से तैयार होकर प्रवीन के साथ निकल पड़ा! दोनो अपने अड्डे(रामलाल समोसा कॉर्नर) पे बैठ सब कुछ भूल के समोसे चाप रहे थे तभी प्रवीन ने बोला..
“आज प्रपोज़ डे है बे!”
“अच्छा! तो आज मार खाने का प्रपोज़ल माँगोगे?”
“नहीं! अब तो उसके सामने जाने की भी हिम्मत नही है! समीर खेला खेल ले गया यार!”
“थोड़ी देर रुक के नहीं डाल सकते था फूल? इत्ता क्यूँ ज़ल्दिया गए?”
“यार तुम ही डंडा किए पड़े थे! अब कला बता रहे हो हमको!”
“चलो लेट हो रही! स्कूल चलते हैं!”
प्रवीन और अर्पित क्लास में पहुँचे और प्रपोज़ करने के तरीक़े ढूँढने लगे! कैसे करें? कैसे करें? यही सवाल उनके मन में गूँज रहा था! एक बार को ख़याल आया के पुर्चि में लिख कर देदे पर कल वाला काण्ड सोच के हिम्मत नही हुई! छुट्टी हुई और प्रवीन-अर्पित निकल पड़े स्कूल के बाहर! बाहर निहारिका अपनी सहेली मेघा के साथ साईकिल निकाल रही थी! अर्पित ने सोचा मेघा काम की बंदी है! मेघा उसके मोहल्ले की भी थी तो उसकी बात भी मान जाएगी! ऐसा सोच के अर्पित ने मेघा को आवाज़ दी..
“मेघा जी! सुनिए!” (अर्पित ने आवाज़ लगायी)
“हाँ!” (मेघा ने अर्पित को हाथ हिलाते हुए देखा!)
मेघा निहारिका से दूर होकर अर्पित के पास आगयी! अर्पित ने झिझकते हुए कहा..
“कैसी हैं आप?”
“ठीक हैं! तुम बताओ! किस क्लास में पहुँचे?”
“सातवीं”(अर्पित ने खिसियाते हुए कहा!)
“अच्छा! हाँ बताओ क्या बात है?”
“वो निहारिका को एक ठु msg पास करना था! आप बोल देंगी क्या?”
“शरम नही है? तुमसे बड़ी क्लास में है वो! बताते हैं तुम्हारी भाभी से! आज शाम को आएँगे तुम्हारे घर!” (मेघा ने घूरते हुए कहा!)
“अरे नही नही..” (अर्पित की बात ख़त्म होने से पहले मेघा वहाँ से निकल गयी!)
“साले चोरकट! तुम्हारे चक्कर में हमारी लंका लग गयी!” (अर्पित ने काँपते हुए कहा)
“हाँ ससुर! ये आइडिया हमारा ही तो था न?” (प्रवीन की मंद मंद मुस्कान तीखा प्रहार कर रही थी!)
दोनो झुराए हुए घर को निकल लिए! रामलाल की दुकान आते ही दिल सब कुछ भूल के फिर समोसा पे आगया! “चाचा दो ठु समोसा दयो” दोनों समोसा खा ही रहे थे के अचानक पीछे बने पी॰सी॰ओ॰ पे फ़ोन की घंटी बजी! दोनो ने मुसकियाते हुए एक दूसरे की तरफ़ ताका और अर्पित ने कहा
“क्या तुम भी वही सोच रहे हो जो हम सोच रहे हैं?”
“हाँ” (प्रवीन ने चमचमाती आँखों से कहा!)
“तो निहारिका के घर का नम्बर कैसे पता चलेगा?”
“अरे उसका जुगाड़ तो हम पहले ही कर लिए थे! शर्मा सर के पास उसकी स्कूल डायरी थी हम वहीं से छुवा लिए” (प्रवीन ने लहरियते हुए कहा!)
“रामलाल चच्चा तो उधार कर भी लेंगे पर ये चौरासिया PCO वाला कैसे मानेगा?”
“देखो बस्ते की पीछे वाली चेन में दो रुपए छुट्टा पड़ा होगा शायद” (प्रवीन ने उम्मीद से कहा!)
“क़िस्मत अच्छी है तुम्हारी!” (अर्पित ने सिक्का निकाला और प्रवीन की हथेली पर रख दिया!)
“Hehehe अबे डर भी लग रही और मज़ा भी आरही! यहाँ तो काम बन ही जाएगा!” (प्रवीन ने इक्सायटेड होकर निहारिका का नम्बर लगाया)
ट्रिंग ट्रिंग
“हल्लों!”
“हल्लो निहारिका! हमको तुम बहुत अच्छी लगती हो! I love you! कल फूल भी तुम्हारे लिए लाए थे! पर वो…”
“कौन हरामखोर बोल रहा है रे? हैन? निहारिका ये किसका फ़ोन है? आने दो निहारिका के पापा को बताते हैं बड़ी आशिक़ी चढ़ी है तुमको!” (निहारिका की मम्मी फ़ोन पे थी और गुर्राते हुए हड़का रही थीं!)
“आंटी! हम वो! वो! (‘अबे कह दो समीर बोल रहे हैं’ अर्पित ने फुसफुसाते हुए कहा!) हम समीर बोल रहे हैं 8th B से!”
“समीर? कौन समीर? रह जाओ आते हैं कल स्कूल! निकालते हैं तुम्हारी आशिक़ी!” (निहारिका की मम्मी का गरियाना चालू था और इधर प्रवीन फ़ोन रख चुका था!)
“कल बहुत तेज़ बन रहे थे समीर बेट्टा! अब कल कूटे जाएँगे!” (प्रवीन ने अर्पित से ठहाके लगाते हुए कहा!)
“हम कहे थे न अभी पूरा हफ़्ता बाक़ी है!”
“तुम ढेर न हँसो ससुर! मेघा तुम्हारे घर पहुँच रही होगी!” (प्रवीन ने याद दिलाया)
“अबे हाँ! जल्दी चलो बे!” (और वो दोनो घर के लिए चल पड़े!)
पी॰एस॰- क्या समीर की कल कुटाई होगी? क्या निहारिका सच जान पाएगी? निहारिका के पापा मम्मी कल क्या करेंगे? क्या हो अर्पित का जब मेघा उसके घर पहुचेंगी! जानने के लिए जुड़े रहिए! कहानी पूरे हफ़्ते भर चलेगी! मज़े लेते रहिए!

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