**मोहब्बत सुबह का सितारा है: भाग 1**

“अल्लाह को मानता ही नहीं तो उसके घर में कैसे दाख़िल हो जाऊँ?”

“लेकिन बाबा जान….”

“सबा बेटा, अपने करिश्मों से ख़ुदा दुनिया को बेवकूफ़ बना सकता है, सलमान अब्बास को नहीं। मैं इनके वजूद का इनकार करता हूँ।”

सबा वहाँ से चली गयी। मस्जिद के बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे। मैं घास पर जाकर बैठ गया और अपनी गुज़री ज़िन्दगी की यादों में खो गया, लेकिन उस वक़्त मुझे इस बात का अंदाज़ा कहाँ था कि ये कहानी हुमा अली से शुरू होगी, क्योंकि उस वक़्त सबा का तो नाम-ओ-निशान नहीं था मेरी ज़िन्दगी में।

**27 साल पहले**

हमारे दूर के एक cousin की शादी थी। हम सभी लड़के दुल्हन के यहाँ काम करने में लगे हुए थे, या फिर यूँ कहिये कि काम करना तो एक बहाना था, असल मक़सद तो लड़कियों को देखना था, या फिर अगर मैं और precisely बात करूँ, तो असल मक़सद उन्हें इम्प्रेस करना था।

“देख, फ़रहा कितनी खूबसूरत लग रही है,” हैदेर ने मुझे कचौड़ियों की प्लेट थमाते हुए कहा।

हैदर फ़रहा को पसंद करता था, और कहीं ना कहीं मुझे लगता था कि वो भी उसे पसंद करती है, लेकिन उस वक़्त मेरी नज़रें सिर्फ़ एक शख़्स को खोज रहीं थी – फ़रहा की बड़ी बहन, हुमा को।

मैं हुमा को बचपन से पसंद करता था। उसकी बात ही अलग थी। मोहतरमा मिर्ज़ा ग़ालिब पर PhD कर रही थीं। ग़ालिब के एक-दो शेर तो हमेशा उनकी जुबां पर रहते थे और उनके बस्ते या टेबल पर हमेशा दीवान-ए-ग़ालिब रखी रहती थी। बहुत बार कोशिश की, कि अपना हाल-ए-दिल बयान करूँ, लेकिन हाल कुछ ऐसा था कि,

“हम हार गए तंगी-ए-अल्फ़ाज़ के आगे,
कहने को बहुत कुछ था, मगर कुछ कह ना सके हम।”

**

घर में मिठाइयों के डिब्बे आये हुए थे। मैंने अपनी अम्मी से पूछा कि ये मिठाइयाँ कहाँ से आई हैं, तो कहने लगीं, “हुमा का रिश्ता तय हुआ है। लड़के का नाम इमरान है, दुबई में रहता है, engineer है।

कुछ पलों के लिए मुझे ऐसा लगा मानो मेरी दुनिया बिल्कुल ख़त्म हो गयी हो। सारे ख़्वाब जो मैंने देखे थे, सारी रोमांटिक आउटिंग्स जो मैंने प्लान की थीं, वो सारे surprises जो मैं हुमा को देना चाहता था, वो सबके सब अब मुझे बेमाने लगने लगे थे।

“ना जाने क्यों इंतेज़ार है तेरा,
एक ऐसे मोड़ पर जो तेरी रहगुज़र भी नहीं।”

*

हुमा हमारे घर आई हुई थी। हमारी नज़रें मिलीं। अब तो उसकी हर एक नज़र मुझे मेरी शिकस्त का एहसास दिलाती है। उसकी मुस्कुराहट और आँखों की चमक मेरी नाकामी की ज़िंदा ताबीर बन चुकी है। और मुझे नहीं पता कि मैं इस एहसास से कैसे लड़ पाउँगा। कैसे बर्दाश्त कर पाउँगा मैं कि उसकी हथेलियों पर मेरे सिवा किसी और के नाम की मेहंदी हो? कैसे इस बात पर सब्र कर लूं कि मेरे सिवा कोई और शख्स उसके होंठों पर फैली मुस्कराहट का सबब बने। कैसे समझाऊँ इस दिल-ऐ-बेक़रार को, कि शब-ओ-सहर वो जिस महज़बीं की हसरतों की तमन्ना करता था, उसका ख़्याल भी अब उसके लिए हराम हो चुका है? कैसे दिलासा दूँ इन नम आँखों को, जो ज़र्रे-ज़र्रे में उसका अक्स ढूंढती फिरती हैं?

“साँसों में बस्ती है खिज़ा अपनी, है सीने में क़ैद सेहरा,
पी जाएं दरिया भी पर वो प्यास है कि जाती नहीं।
क़ज़ा नींदों को किया अपनी कि तुम ख़्वाब में ना आओ,
पर तुम्हारी यादें हैं कि याद आने से बाज़ आती नहीं।
खुदा की बनाई क़ायनात तो बेशक बेहद खूबसूरत है,
हमारी निगाह-ए-काफ़िर है कि तुमसे हटकर कहीं जाती नहीं।”

*

प्यार इश्क़ और मोहब्बत में क्या फ़र्क है? कोई फ़र्क है भी, या फिर ये तीनों एक ही एहसास के तीन अलग अलग मुक़ाम हैं? अगर ग़ौर किया जाये तो प्यार उस रोशन एहसास की इब्तेदा है, और इश्क़ उसकी इंतेहा है। हम में से हर शख्स इन तीनों मराहिल से होकर गुज़रता है। पहले उसे किसी से प्यार होता है। बहुत बार लोग दिलकशी को प्यार समझ बैठते हैं। प्यार और दिलकशी में फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि प्यार वक़्त के साथ मोहब्बत में तब्दील हो जाता है, जबकि दिलकशी वक़्त के दरिया में बहकर फ़ना हो जाती है।

इंसान जब किसी से मोहब्बत कर बैठता है तो उसके साथ अपनी सारी खुशियों को वाबस्ता कर लेता है। मोहब्बत हो जाने के बाद इंसान की individuality खत्म हो जाती है। अपने महबूब को वो अपनी सारी तमन्नाओं का सरमाया बना लेता है, उसकी मुस्कराहट से उसे ताक़त मिलती है, और उसके आँसुओं से उसे तकलीफ़ पहुंचती है। मोहब्बत में “मैं” की गुंजाइश नहीं होती। सिर्फ़ “हम” कहने वाले ही सच्ची मोहब्बत का दावा कर सकते हैं।

इश्क़ वो मरहला है जब आशिक़ अपने महबूब की मोहब्बत में अपने खुद के वजूद को खो बैठता है। इश्क़ ला-हासिल है, क्योंकि जो हासिल हो जाये, उसे इश्क़ नहीं कहा जा सकता। किसी को इस क़दर टूट कर चाहना कि आपकी हर आह में उसकी खुशबू बस्ती हो- यही इश्क़ है। किसी से इतनी मोहब्बत करना कि उसके बाद आप किसी और से मोहब्बत करने के काबिल ना रहें- यही इश्क़ है। किसी शख़्स के ख़्यालों में इस तरह डूब जाना, कि बाकी दुनिया आपके लिए non existent बन जाये- यही इश्क़ है। इश्क़ ला-हासिल है क्योंकि इश्क़ पर सिर्फ़ खुदा का हक है। मैंने उस लड़की से इश्क़ करके उसे ख़ुदा के बराबर लाकर खड़ा कर दिया था। इस अमल का नतीजा मात और पछतावे के सिवा और हो भी क्या सकता था?

मैं सिर्फ़ एक बात जानता हूँ कि अगर ज़िन्दगी ने मुझे फिर से मौका दिया तो मैं फिर से उससे उतनी ही मोहब्बत करूँगा, यहां तक कि मेरे जिस्म और रूह के दरमियां जो रिश्ता है वो खत्म हो जाये।

“मौत तो बड़ा हसीन तोहफ़ा है मुझ बदनसीब के लिए,
ज़िंदगी तू बता और कितना सितम अभी बाक़ी है,
सब कुछ लुट गया है पर इसकी बेग़ैरती तो देखो,
दिल में तुम्हें पाने की तमन्ना अभी बाक़ी है।”

*

दिसम्बर का महीना था और तेज़ सर्द हवाएं चल रही थीं। शायद आज हवाएँ भी मेरे ग़म में शरीक थीं।

“प्लीज़ हैदर, मेरा ये ख़त हुमा तक पहुँचा दो।”

“अब इन बातों का क्या फायदा सलमान?

“फ़ायदा-नुकसान मैं नहीं समझता। बस, इसे मेरी ज़िद समझ लो। और वैसे भी हुमा को कभी पता नहीं चलेगा कि ये ख़त किसने लिखा है, क्योंकि मैंने इसमें अपना नाम नहीं लिखा है।”

हैदर ने वो खत चुपके से हुमा के कमरे में रख दिया।

वो ख़त कुछ ऐसा था, “तुम्हारा नाम लेना अब मेरे लिए मुनासिब नहीं है। मैंने खुद से बार बार पूछा कि मैंने तुमसे मोहब्बत क्यों की? तुम्हारे नाम के सिवा मैं तुम्हारे बारे में जानता ही क्या हूँ? फिर सोचा कि ऐसे फ़िज़ूल सवाल मुझे ख़ुद से नहीं करने चाहिए। मोहब्बत का कोई साइंटिफिक फॉर्मूला तो है नहीं कि दो atom हाइड्रोजन के ऑक्सीजन के एक atom से मिलाओ तो मोहब्बत हो जायेगी।

मोहब्बत तो बस हो जाती है। कब, कहाँ, कैसे, इस बात का इल्म सिर्फ़ ख़ुदा रखता है। ये दिल भी पागल है, जिसे पसंद कर लेता है उसे चाहने के लिए उसे किसी दलील की ज़रूरत नहीं पड़ती है। चाहे उस शख़्स में कितने ही ऐब क्यों ना हों, सब कुछ नज़रअंदाज़ करके दिल उसकी किसी एक ख़ूबी का कायल हो जाता है।

मैं तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ और अपनी आखिरी साँस तक करता रहूँगा। फिर क्या हुआ कि अगर तुम्हारी शादी हो गयी? जब तुम्हारे बच्चे होंगे तो मैं उनसे भी उतनी ही मोहब्बत करूँगा, क्योंकि उनका वजूद तुम्हारे लिए खुशी का सबब बनेगा। मेरी वजह से तुम्हें अपनी आने वाली ज़िन्दगी में कभी कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम्हारे दामन और इज्ज़त पर कोई आंच आये उस से पहले मैं मरना ज़्यादा पसंद करूँगा।

तुम मेरे लिए अफ़सोस मत करना, क्योंकि मुझे तुमसे मोहब्बत करने का कोई अफ़सोस नहीं है। मोहब्बत करने से पहले मैंने ये शर्त तो नहीं रखी थी कि तुम भी मुझसे मोहब्बत करोगी। कोइ ऐसी शर्तें रख भी नहीं सकता क्योंकि जहाँ शर्तें होती हैं, वहां मोहब्बत नहीं, खुदगर्ज़ी होती है। मेरी एकतरफ़ा मोहब्बत के इस सफर को शायद कभी वस्ल का साहिल नसीब ना हो, लेकिन ये सफ़र मेरी पूरी ज़िन्दगी का हासिल है। तुम्हारी मोहब्बत मेरी बेमानी ज़िन्दगी का सबसे हसीन तज़ुर्बा है। मेरे दिल के साँचे में सिर्फ़ तुम्हारी तस्वीर है। चाहे वो वक़्त और हालात के तूफान हों या ग़मों की तपिश, उस तस्वीर पर मैं कभी आंच नहीं आने दूँगा।

मैं खुद को तुमसे मोहब्बत करने से नहीं रोक सकता, और इसी मोहब्बत का तकाज़ा होगा कि मैं हमेशा दुआ करूँगा कि तुम जहाँ रहो, जिसके साथ रहो, खुश रहो। ख़ुदा तुम्हारी सारी ख्वाहिशों को पूरा करे और तुम्हें ज़िन्दगी की हर तकलीफ़ से महफूज़ रखे। सिर्फ़ एक बात याद रखना- इस ज़मीन और आसमान के दरमियां एक शख्स ऐसा भी है जो तुम्हारी मुस्कुराहट के लिए हँसते-हँसते अपनी जान दे देगा। तुम्हें ग़ालिब को पढ़ने का बहुत शौक है ना? मैं ग़ालिब के लफ़्ज़ों में अपना हाल-ए-दिल बयान करता हूँ,

“आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक,
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल ना करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक”

**

मैं बिस्तर पर लेट गया। मेरे पूरे जिस्म में एक अजीब सी कंपकपी थी। आज इस ज़मीन और आसमान के दरमियां इमरान अली से ज़्यादा खुशनसीब शायद ही कोई दूसरा शख़्स हो।

**दो साल बाद**

“तुम्हें मालूम है कि मैं फ़रहा से मोहब्बत करता हूँ, फिर भी तुमने उसके यहाँ रिश्ता भेजा अपने लिए?” हैदर ने मुझसे चिल्लाते हुए पूछा।

“हैदर, ये तुम क्या कह रहे हो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।”

“क्यों जान-बूझकर अनजान बन रहे हो सलमान?”

“ख़ुदा की क़सम, मुझे कुछ भी नहीं मालूम है हैदर। तुम फ़ोन रखो, मैं तुमसे बात करूँगा बाद मैं।”

वही हुआ जिसका मुझे डर था। मेरे घर वालों ने फ़रहा का रिश्ता मांगा था मेरे लिए। मैंने अपने घर वालों को समझाने की बहुत कोशिशें की, लेकिन कोई मेरी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं था। सबकी ज़ुबान पर एक ही सवाल था।

“आख़िर बुराई क्या है फ़रहा में?”

हमारी society में अगर कोई लड़का किसी लड़की के रिश्ते को कुबूल ना करे तो लोग समझते हैं कि लड़की में कोई ऐब है, जब की मेरा मानना है कि ये बहुत छोटी सोच है। क्या किसी शख़्स को, चाहे वो लड़का हो या लड़की, ये हक़ नहीं कि वो बिना कोई वजह बताये किसी से शादी ना करे?

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, और मेरी आँखों से नींद गायब थी। जब तीन-चार करवटें बदलने के बाद भी मेरे दिल को सुकून ना मिला तो मैं समझ गया कि इस मसले को हल किये बिना मुझे चैन नहीं मिलेगा। मैंने घड़ी की तरफ़ देखा, रात के साढ़े नौ बज रहे थे। फ़रहा को फ़ोन करूँ या नहीं, इसी कशमकश में मेरा दिल बेचैन था। मैंने decide किया कि मुझे उससे बात करनी चाहिए।

“फ़रहा, आप सोच रही होंगी कि मैंने आपको इस वक़्त कॉल क्यों किया। यकीन जानिए, मेरा आपसे बात करना बहुत ज़रूरी था।”

“आप कहिये, मैं सुन रही हूँ।”

“फ़रहा, आपको पता होगा कि मेरे घर वालों ने मेरे लिए आपका रिश्ता मांगा है। फ़रहा, आप इस रिश्ते के लिए मना कर दें।”

“ये आप क्या कह रहे हैं?”

“फ़रहा, मैं जानता हूँ कि आप हैदर को पसंद करती हैं। आपको ख़ुदा का वास्ता, थोड़ी सी हिम्मत कीजिए और इस रिश्ते के लिए इनकार कर दीजिये।”

“मैं किसी से मोहब्बत नहीं करती।”

“फ़रहा, आप बहुत बड़ी ग़लती कर रही हैं। इस दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें उनसे शादी करने का मौक़ा मिलता है जिनसे वो मोहब्बत करते हैं; बाकी लोगों को तो उनसे मोहब्बत करनी पड़ती है, जिनसे उनकी शादी हो जाती है।”

“मैं किसी से मोहब्बत नहीं करती,” फ़रहा ने अपनी बात दोहराई।

“आपसे बात करने का कोई फ़ायदा नहीं है। मश्रीकी लड़कियां बेवक़ूफ़ होती हैं। हँसते-हँसते अपनी माँ-बाप की ख़ुशी के लिए उस शख्स से शादी कर लेंगी जिन्हें वो जानती तक नहीं। घुट-घुट कर जीती रहेंगी लेकिन अपनी मोहब्बत का कभी इक़रार नहीं करेंगी।”

इतना कहकर मैंने फ़ोन काट दिया। मुझे पता था कि मुझे क्या करना है। अब इस मामले को वही शख़्स हल कर सकता है जिस से मैं ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं मिलना चाहता था। हुमा का ख़्याल दिल में आते ही मैं फिर से बेचैन हो गया।

*

“क्या ऐब है फ़रहा में?” हुमा ने मुझसे पूछा।

“फ़रहा में कोई ऐब नहीं है। खुशकिस्मत होगा वो शख़्स, जिसके घर की रौनक बनेगी वो।”

“तो फिर?”

“कुछ नहीं।”

“मतलब?”

“मतलब ये कि मैं किसी और लड़की से मोहब्बत करता था और अब मुझे नहीं पता कि मैं किसी और से मोहब्बत कर भी पाउँगा या नहीं।”

हुमा की आँखें फटी की फटी रह गयीं।

“कौन थी वो लड़की?”

ये किस आज़माइश में डाल दिया है ए खुदा तूने मुझे। आज इतने सालों बाद, फिर से मेरे सामने वही सवाल है और आज भी मैं लाजवाब खड़ा हूँ।

“मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि वो लड़की कौन है, कि जो मैंने बता दिया, तो रिश्तों के सारे मायने ही पलट जायेंगे तुम्हारे लिए,” मैंने अपने आप से कहा।

“तुम्हारा इस बात से क्या concern है?”

“कोई concern नहीं है।”

दो कदम आगे बढ़ते हुए उसने अपना हाथ मेरे काँधे पर रखा।

“लेकिन दोस्त होने के नाते हम एक दूसरे का ग़म तो बाँट ही सकते हैं ना?”

“हमारे दरमियां ऐसा कोई रिश्ता नहीं है कि हम एक दूसरे से अपने राज़ share करें।”

“तुम बहुत बड़ी ग़लती कर रहे हो। क्या हासिल हुआ तुम्हें अपनी मोहब्बत से?”

“अगर मोहब्बत में भी लोग नफ़ा और नुकसान देखने लगें, तो फिर इस दुनिया में क्या बचेगा? ख़ुदा ने मोहब्बत करने वालों के सदके में इस दुनिया के वजूद को बाकी रखा है, वरना इंसान तो कब का ख़ुदा की इस दुनिया में रहने का हक़ खो चुका है। मोहब्बत करने वाले खुदगर्ज़ और मतलबपरस्त नहीं होते। ख़ुद ज़हर पीकर दूसरों को ज़िन्दगी देते हैं।”

हुमा बिल्कुल किसी मूरत की तरह वहाँ खड़ी थी। मेरे एहसासात की शिद्दत ने उसे भी ला-जवाब कर दिया था।

“जिस लड़की से तुम मोहब्बत करते हो, वो दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की है। मैं अब तुमसे कुछ नहीं कहूँगी। अपनी मोहब्बत से कभी ना-आशना मत होना, कभी उसका दामन मत छोड़ना क्योंकि मोहब्बत वो वाहिद जज़्बा है जिसकी तक़दीर में शिकस्त लिखी ही नहीं गयी है। मोहब्बत की हमेशा जीत होती है। हमेशा।”

मैंने अपनी आँखें बन्द कर लीं। जिस लड़की के लिए मेरे दिल में ये एहसास पनप रहे थे, वो तो कभी इनकी शिद्दत को समझ ही नहीं पायी। मेरी मोहब्बत की तक़दीर में तो सिर्फ़ और सिर्फ़ शिकस्त लिखी है।”

“देखो हुमा, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। इसे तुम मेरी गुज़ारिश समझना। हैदर फ़रहा को पसंद करता है, और मुझे लगता है कि वो भी उसे पसंद करती है। कुछ कहने से पहले मेरी एक बात सुन लो। फ़रहा कभी अपनी जुबां से अपनी मोहब्बत का इक़रार नहीं करेगी। लेकिन मैं जानता हूँ यार। मैंने उसकी आँखों में मोहब्बत देखी है हैदर के लिए। वो उफ़ तक नहीं करेगी और अपनी पूरी ज़िन्दगी उस शख़्स के साथ गुज़ार देगी जिसे तुम लोग उसके लिए चुन लोगे, लेकिन क्या ये तुम्हारी बहन के साथ बहुत बड़ा ज़ुल्म नहीं होगा?”

“हैदर के ना खाने का ठिकाना है ना रहने का। ऐसे लड़के को चुना है तुमने मेरी बहन के लिए?”
पीछे मुड़ते हुए मैंने उस से नज़रें मिलाई।

“लड़का लायक है हुमा, ये तुम भी जानती हो। कुछ नहीं तो कम से कम engagement ही करा दो दोनों की। नौकरी का क्या है, आती जाती रहती है। मुझे पूरा यकीन है कि वो फ़रहा को बहुत खुश रखेगा।”

“मैं अम्मी-अब्बु से बात करुँगी,” हुमा ने मुस्कुराते हुए कहा।

हुमा ने मेरे दिल से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया था। मैं अपनी लव स्टोरी को तो पूरी नहीं कर पाया, लेकिन अगर मैंने किसी की भी मोहब्बत को उसके सही अंजाम तक पहुँचा दिया तो मैं समझूँगा कि मेरा दर्द थोड़ा कम हो गया है।

*

“मैं अब तुम्हारी एक नहीं सुनूँगी सलमान। मैंने तुम्हारे लिए सबा का रिश्ता माँगा है, और याद रहे, इस बार कोई ऐसी हरकत ना करना जिस से मुझे खानदान में शर्मिंदा होना पड़े।” मेरी अम्मी ने मुझसे कहा।

मैंने शादी के लिए अपनी रज़ामंदी ज़ाहिर कर दी। मेरे लिए इस शादी की हैसियत सिर्फ़ और सिर्फ़ एक समझौते की थी। सबा के घर वालों ने रिश्ता कुबूल कर लिया। हमारे घर में शादी की तैयारियां बहुत ज़ोरों से चल रही थीं। एक रात जब में गहरी नींद में था तो एक फ़ोन कॉल से मेरी नींद टूट गयी।

“हेल्लो?”

“हेल्लो, जी मैं सबा बात कर रही हूँ?”

“सबा…..कौन?…..अच्छा सबा, आपने इतनी रात को फ़ोन किया, सब ख़ैरियत?” मैंने अपने बिस्तर से उठते हुए कहा। “और ये आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला?”

“मैंने सुना है कि ढूँढने वाले ख़ुदा को भी ढूँढ लेते हैं। मैं एक नंबर नहीं ढूँढ सकती?”

“लगता है आपको philosophy में काफ़ी दिलचस्पी है।”

“Philosophy का तो नहीं पता लेकिन, आपको मेरी पसंद और नापसंद में काफ़ी दिलचस्पी है,” सबा ने हँसते हुए कहा।

“सॉरी?”

“Anyway, मुझे आपसे एक बहुत ही अहम बात शेयर करनी थी। हमारी शादी होने वाली है इस वजह से मैं नहीं चाहती कि हमारे बीच कोई राज़ रहें।”

“आप बिल्कुल frankly अपनी बातें कहें।”

“मैं किसी और शख़्स से मोहब्बत करती थी, लेकिन अब मेरा कोई वास्ता नहीं है। आप ने जो फ़ैसला किया है मुझसे शादी करने का, उस पर फिर से ग़ौर कर लीजिये।”

“P-E-R-F-E-C-T,” मैंने अपने आप से कहा।

“On the contrary, I think that we’ll compliment each other very well,” मैंने कहा।

“Thank you very much. आप नहीं जानते कि आप ने मेरे दिल पर से कितना बड़ा बोझ हटा दिया।”

 

कहानी जारी है…

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