प्यार के साइड-इफेक्ट्स

भाग तीन : प्यार के साइड-इफेक्ट्स
(भाग एक : “पहला प्यार” और भाग दो: “लव-लेटर” से पुनरारंभ)
आज कल स्कूल के टीचर्स को पता नहीं क्या हो गया था, ढंग का कुछ भी नहीं पढ़ा रहे। वो तो मेरी पुरानी मेहनत की बचत थी जो आज भी काम चल जाता था। थोड़ी भूख कम लगने लगी थी। एक शोर मचता था दिमाग में और उनका चेहरा फ़्लैश होकर ख़त्म हो जाता, मानो बिजली कड़की हो। पहले तो, कोई मर गया, मैं छत से कूद गया, मम्मी ने बहुत मारा, ऐसे ही सपनें आते थे। लेकिन आजकल अपग्रेड हो गया था मैं। मुझे रोमैंटिक सपने आने लगे थे।
परसों हम मिले थे और पिछले दो दिनों से वो मेरे सपनों के घर में बिना पूछे घुस आती थी। ऐसा नहीं है कि वो पूछती तो मैं मना करता, लेकिन फिर भी पूछ तो लेती। इसी बहाने दो बातें तो हो जातीं।
आज प्रिंसिपल ने मुझे किसी बात के लिए छुट्टी के बाद अपने ऑफिस में बुलाया था, तो चाय कैंसल करनी पड़ी। हमारे डाकिया दीपक के हाथ मैंने जो चिठ्ठी भिजवाई थी, ये बताने के लिए कि नहीं आ सकूंगा आज मिलने, उसका कोई जवाब नहीं आया था अब तक। शुरू होने के पहले ही ख़त्म हो गयी क्या लव-स्टोरी अपनी?
हाँ, तो प्रिंसिपल ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया और कहने लगे, “पटना में ‘भारत को जानो’ जिला स्तर पर क्विज़ हो रही है। पिछले 3 साल से हम कोशिश कर रहे हैं लेकिन हमारा स्कूल टॉप 5 में भी नहीं आ पाता। इस बार हमको पूरी उम्मीद है कि तुम ये ढर्रा बदलोगे।”
दो लोगों की टीम थी, और जैसा आप सोच रहे हैं मैंने भी वही सोचा। ऋचा को टीम में नहीं ले सकते क्योंकि स्कूल के दक़ियानूसी नियमों के ख़िलाफ़ था। या तो सिर्फ लड़कों की या सिर्फ लड़कियों की ही टीम बनेगी। अगर तुम नहीं जाओ तो ऋचा जायेगी, क्लर्क ने बताया मुझे।
स्कूल से लौटते वक़्त मैं ख़ुश से ज़्यादा परेशान था। एक तो चाय कैंसिल हो गयी, दूसरा उसका कोई रिप्लाई नहीं आया और तीसरा सर ने इतनी बड़ी उलझन दे दी दिमाग़ में। मैंने सोचा मम्मी को बोल दूंगा कि मीटिंग लेट तक चली और मैं निकल पड़ा दीपक के यहाँ। दीपक के लिए मैंने एक लाइन लिखी थी और सुनाई भी थी मग़र पसंद नहीं आई थी भाईसाहब को। उसकी टेढ़ी आँखें सुबूत थी।
“कुछ तो बात है शख़्सियत में उनकी
हर बार उनका नाम होता है मगर बदनाम होकर।”
दीपक का दोस्त स्कूल का सबसे स्मार्ट लड़का है, इस बात की ख़ुशी उसकी माँ के चेहरे पर साफ़ दिख रही थी। मैं जब माँ के साथ कहीं भी जाता तो पहले से आदेश मिले होते थे कि बोल देना चाय नहीं पीता मैं। कुछ खाऊंगा नहीं, अभी खाकर आया हूँ। इसलिए जब चाय और बिस्कुट मिले तो मैंने माँ की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाकर चाय की प्याली में होंठ डुबा लिए। आंटी जब चली गयीं तो दीपक की आँखें मुझसे ढेर सारे सवाल कर रही थीं। मैंने इनका जवाब अल्फाज़ों में देना बेहतर समझा। नज़रों की ज़बान में बहुत कंफ्यूज़न है यार, ख़ासकर जब इश्क़ का सब्जेक्ट हो।
“अबे, वो कुछ बोली?” मेरी लार टपकाती आँखें जवाब के इंतज़ार में तकने लगी अपने लव गुरु को।
“नहीं, कुछ ख़ास नहीं। बोली कि टाइम नहीं है तो फ़ालतू में मैं अब परेशान नहीं करूंगी।” दीपक ने झेंपते हुए कहा।
पनौती हूँ मैं। अभी तो सपने आने शुरू हुए थे कि नींद भी टूट गयी।
“अबे, सॉरी यार। कुछ उपाय लगा दे।” मैंने दीपक के हाथों को थोड़ा ज़ोर से जकड़ते हुए बड़े ही प्यार से कहा।
“लड़की है अपने मन की। गुस्सा जाए तो मम्मी पापा को भी सुना देती है। तो अब कुछ दिन तू आराम से रह, मैं बात करने का ट्राय करता हूँ।” दीपक की बातों में दिलासे से ज़्यादा, “तेरी प्रेम कहानी ख़त्म” वाली बू आ रही थी।
अपना बैग उठाकर मैं अपने दिल को, जो बाहर आ गया था अपनी सीमाओं से, वापस मोड़ के भीतर रखने की फिज़ूल कोशिश करने लगा।
********
दो हफ़्ते से मेरी बात नहीं हुई ऋचा से। दीपक ने बताया कि वो नाराज़ तो थी ही और उस पर उसकी जगह तुम्हें भेज दिया क्विज़ में तो और आगबबूला हो गयी वो। प्रिंसिपल के पास शिकायत भी आई तो प्रिंसिपल ने साफ़ साफ़ कह दिया कि हम अपने स्कूल के बेस्ट लड़के को भेज रहें हैं। हमारी दोस्ती को जलन की नज़र लग गयी थी।
क्विज़ हुआ और उम्मीद के मुताबिक़ मेरा ग्रुप फर्स्ट आया। अगले दिन पूरे स्कूल में हमारी तारीफ़ों के पुल बनने थे। 2007 में जब वर्ल्ड कप जीतकर टीम इंडिया वापस आयी थी, तो कैसे खुली बस में घूमीं थी पूरी मुम्बई में। इतना बड़ा तो नहीं, लेकिन कुछ तो ऐसा ही सोचा था मैंने कल के लिए।
अगले दिन जब मैं स्कूल पंहुचा तो प्रिंसिपल ने बुलाया और ढेर सारी तारीफ़ के बाद बोले, “हमारे स्कूल में इतनी बड़ी कोई जगह नहीं जहाँ 2000 बच्चे साथ में बैठ सकें। तो ऐसा करते हैं कि तुम लोग ही नागेंद्र सर के साथ क्लास-क्लास चले जाओ।”
गुस्सा तो आया मुझे ये सुनकर लेकिन गर्ल्स बिल्डिंग भी जाने को मिलेगा, ऐसा सुनकर मेरे प्रेम के कीड़े गुस्से को खा गए।
गर्ल्स फ्लोर भी उन्हीं गर्व की नज़रों से मुझे देख रहा था। ज़िन्दगी में पहली बार सेलिब्रिटी वाली फीलिंग आ रही थी। कैसे पढ़ते हैं आप, एक्सरसाइज़ करते हैं क्या, बुक कौन सा फॉलो करते हैं, ब्रेकफास्ट क्या करते हैं, अखरोट से दिमाग़ बढ़ जाता है क्या? ये सारे सवाल लोग मुझसे ऐसे पूछ रहे थे मानों मैं स्टीफेन हॉकिंग्स हूँ। इन सवालों पर थोड़ी हँसी आती भी तो इनको बुरा ना लग जाए, इसलिए रोक लेता था।
इन सारे सवाल और बहुत सारे क्लासेज़ से अपना सफ़र ख़त्म होकर 9-A पहुचाँ, जो मेरी ज़िन्दगी का मक्का-मदीना बन गया था।
नागेंद्र सर ने शुरू किया, “ये है समीर और ये मनीष। इन दोनों ने स्कूल का नाम ‘भारत को जानो’ प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करके बहुत ऊँचा किया है। आप सब लोगों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।”
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मेरी नज़रें आखिरी बेंच पर बैठी, गुमसुम सी, ऋचा पर टिकी थीं। उसकी आँखों से बहता पानी और हँसते हुए होंठ मुझे कंफ्यूज कर रहे थे। थोड़ी देर बाद जब नागेंद्र सर क्लास टीचर से बात करने लग गए, तो मुझे ऋचा की उसी सहेली ने, जो पहली मुलाकात में मेरी सिक्योरिटी बनी थी, हाथ के कोरो को मिलाते हुए एक चिठ्ठी पकड़ा दी। चिट्ठियाँ ही मेरी कहानी बनाएंगी, सोचा मैंने।
स्कूल से लौटते वक़्त, मुकेश के कैरियर पर बैठकर मैंने वो चिठ्ठी पढ़ी।
“अरे, वो ऋचा बहुत बच्ची है। छोटी-छोटी बात पर गुस्सा हो जाती है और जलती भी है तुमसे, लेकिन दिल की बहुत साफ़ है। जब से तुम्हारी बात नहीं होती, अपने छत के छज्जे से हर रोज़ तुमको स्कूल आते-जाते देखती है। दीपक से तुम्हारे बारे में पूछती है, लेकिन सख़्त हिदायत है कि तुम्हें ना बताया जाए। अगर उसको पता लग गया तो मुझे भी मार डालेगी तुमको ये सब बताने के लिए। कल मैं उसे लेकर महावीर मंदिर जाऊंगी, बोलो आओगे?”
“प्लीज़ आना, उसे तुम्हारी ज़रूरत है।” आख़री लाइन थी चिठ्ठी की।
नम आँखों से मैंने चिठ्ठी के कोरों से अपने आंसू पोंछे। शायद प्यार हो गया था हम दोनों को। बिना मिले, बिना बात किये, बिना compatibility चेक किये। शायद प्यार को इनकी ज़रूरत नहीं, समझौतों में ये काम आते है।

 

 

 

 

क्रमशः

 

 

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