*भाग दो : लव-लेटर*

भाग दो : लव-लेटर

(भाग एक : “पहला प्यार” से पुनरारंभ)

नेनुआ की सब्ज़ी और चावल। मतलब दुनिया में इससे बेहतर कोई कॉम्बिनेशन ही नहीं। घर आते ही जब माँ ने खाने के लिए बिठा दिया तो आज पहली बार मैंने अपनी जिंदगी में इस खाने में स्वाद की कमी पायी थी। खाना भी मन के मिजाज़ के हिसाब से लज़ीज़ या फ़क़ीर लगता है, उस दिन पता चला था।
जल्दी जल्दी खाना निपटाकर मैंने अपना बैग उठाया और नीचे चला गया, इस गुप्त कागज़ का राज ढूंढने। दसियों बार कॉपी को झाड़ा, लेकिन मिला नही कुछ। मज़ाक कर दिया दीपक ने, मैंने यही सोच कर अपने फूले हुए मन में से हवा निकाल दी। माँ ने जल्दी से सबको सो जाने का आदेश पारित कर दिया। मैंने बड़ी कोशिश की आज सोने की, लेकिन अंदर का कीड़ा मानने को तैयार ही नहीं था।
जब सब सो गए तब मैंने माचिस के डिब्बे में, जहाँ माँ खुदरा सिक्के रखती है, सेंध लगा दी। 2 रुपये लेकर बड़ी ही सावधानी से दरवाज़ा खोला और चला फ़ोन बूथ के वहाँ। जिस जमाने में मेरे पिताजी के पास भी मोबाइल नही था, दीपक के पास एक बड़ा सा मोबाइल था। जिसमे उसने ढेर सारी गन्दी फिल्में छुपाकर रखीं है, बताया था उसने। मैंने उसका नंबर डायल किया और उस चिड़चिड़ें घंटी के बंद होने का इंतज़ार करने लगा।
“अबे दीपक, मैं समीर। अरे वो उस कॉपी में तो कुछ भी नही।” मैंने अपनी हताशा फ़ोन में लगते बिल को ध्यान में रखते हुए, बिना किसी लाम-लपट के बता दी अपने लव के एजेंट को।
” अच्छे से चेक कर।” बोला तो यही था, दीपक खुद से बात करने लगा।
” दस बार झाड़ लिया, अब क्या पेज फाड़ के देखूं एक-एक।” मैंने जल्दी से कहा।
“अबे ज़िल्द फाड़ कर देख, लड़कियाँ ऐसे सरप्राइज़ देना पसंद करती है।” दीपक के अनुभव सही मदद कर रहे थे मेरी।
मैं भागता हुआ घर आया और जल्दी से कॉपी की जिल्द फाड़ दी। उस जिल्द को,जिसको मैंने आठ आने में ख़रीदा था। प्यार यूँ ही सबसे ज्यादा घातक बीमारी नहीं ।
जैसे ही जिल्द फटा, कागज़ का एक टुकड़ा गिर पड़ा।
“मैं ऋचा। तुम्हें रोज स्कूल जाते देखती हूँ, मेरे दोस्त बनोगे? अगर हाँ तो आज छुट्टी के बाद स्कूल के पीछे जो धोबी की दूकान है, वहाँ मिलना। और अगर दोस्त नही बनना, तो दीपक को इस पेपर के पीछे अपना जवाब भेज देना।” दीपक के अनुभव की मैं जब तक मिसाल देता तब तक इस ख़त ने मेरे नए-नए जवान हुए दिमाग़ में तूफ़ान ला दिया। शारीरिक और मानसिक दोनों हलचलें शुरू हो गयीं। अब तो बस कल का सूरज निकले, यही इंतज़ार था।
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मैंने आज स्कूल पहुँचते ही दीपक को ढूँढा। आख़िर में मेरी पहली प्रेमकहानी, जिसमें मैंने अपने हीर को देखा ही नही था अब तक, उसका अगुआ तो वही था। देखा वो बालकनी में खड़े होकर नीचे आती-जाती लड़कियों से नज़रों की ज़ुबान में बात कर रहा है। मैं जल्दी से उसके पास गया और हंसने लगा। मेरे गाल लाल हो रहे थे। शारीरिक और मानसिक हलचल अब अपने पूरे चरम पर थी।
“ये क्या है? कौन है ये ऋचा? कैसे जानती है मुझे? मैंने देखा है क्या इसको? कैसी है देखने में ? मार तो नही खिलवायेगी भैया से अपने मुझे?” मेरे सवालों की बढ़ती संख्या में दीपक की अनुभवी नज़रें इस लड़की में मेरीे पैदा हुई रुचि सूंघ रहीं थीं।
“अबे थम जा। वो दोस्त बनाना चाहती है और तू तो फॅमिली प्लानिंग तक का सोच लिया।” दीपक ने इस सब्जेक्ट में मेरे भोंदूपना को उसी नज़र से देखा, जैसे मैं क्लास के अधिकतर बच्चों को गणित में देखता हूँ। ऐसा हुआ कि इस साल के मिड टर्म में मेरे 489/500 आये। स्कूल के इतिहास में आज तक किसी को इतने आये नही थे। जो दूसरा नंबर था, वो आया उमेश का लेकिन उसके थे 426। तो हुआ ये कि गर्ल्स विंग (जो अभी-अभी अस्तित्व में आया था मेरे लिए) का भी नंबर मिला दिया गया और तब देखा गया। ऋचा को 460 आये थे और फिर ये बात हुई कि हम तीनों को साथ में प्राइज दिया जाए और यहीं से मेरी और ऋचा की प्रेमकहानी की गंगोत्री निकलती है।
दीपक कैसे इतना सब जानता है, मेरी अचरज भरी नज़रें हर बार सोचके रह जाती थीं। और एक मैं, अंडरवियर तक भूल जाता हूँ पहनना स्कूल के लिए निकलते वक़्त। माँ छत से चिल्लाती है कभी-कभी, तब वापस जाके पहनता हूँ।
वो कहते है ना कि दूर से जो जैसा दिखे, वैसा होता नहीं। हमारे स्कूल के लड़कों को गर्ल्स विंग जाने की सख़्त मनाही थी। अगर कोई आसपास भी दिख जाए तो विनायक सर जो अब बुढ़ापे की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, उनके तेल पिए डंडे का स्वाद जो पिछवाड़े पर पड़ता तो इंसान 2-3 दिन बैठ नही पाता बेंच पर। विनायक सर का मैं चहेता स्टूडेंट, तो उनकी क्लास में मुझे पूरी छूट थी, जो करो जैसे भी करो। उसी क्लास में दीपक ने मुझे एक और कहानी बताई थी।
विनायक सर थोड़े अजीब आदमी है। उनको बच्चों के गालों पर चुम्मा लेना अच्छा लगता है। जितने सपाट गाल, जितनी गोड़ी चमड़ी, उतने बार बलात्कार। मेरी पढ़ाई में जहिनियत से ज़्यादा मेरे कोमल गालों की बदौलत मैं उनका चहेता था। अब जब कभी गर्ल्स विंग में टीचर कम आये तो बॉयज विंग के टीचर्स को वहाँ जाना होता था। पिछले साल, जब दीपक आठवी में था और ऋचा भी, तो विनायक सर को गणित पढ़ाने के लिए गर्ल्स विंग भेज दिया गया। अब जगह बदली थी, इंसान तो वही था। उन्होंने ऋचा से, जिसका स्कूल में पहला दिन था वो, चुम्मा लेने के लिए नज़दीक बुलाया। ऋचा ने प्रिंसिपल को शिकायत कर दी। उसके बाद विनायक सर को गर्ल्स विंग नही भेजा जाता। वैसे मेरा खुद का अनुभव था कि विनायक सर के चुम्मे में ग़लत सोच तो नही होती, लेकिन जवानी के दिनों में कोई 70 साल का आदमी अपने खैनी भरे होंठो से टच करे तो बुरा तो लगता था। पर क्या करें, उनके डंडे को देख चुप रह जाते थे। दीपक की कहानी और ये घण्टी साथ में ख़त्म हुए थे। लड़की काफी गुस्सैल और फॉरवर्ड है, सोचा मैंने।
★★★★★★★★
स्कूल की छुट्टी के बाद जब मैंने मुकेश से कहा कि मुझे एक दोस्त से मिलना है, तू जा घर, तो वो मुझे शक़ की निग़ाह से देखने लगा। बस पढ़ाई में भोंदू था वो। इस फील्ड में तो इसने भी पीएचडी कर रखी थी। मैंने जैसे तैसे उसकी नज़रों से आ रहे xray से अपनी नज़रें बचायी और धोबी की दूकान ढूंढने लगा। 5 मिनट बाद मैं उस दूकान में पंहुचा। मेरी ज़िन्दगी में पहली बार कोई लड़की मेरी तरफ देखकर स्माइल करते हुए तेज़ क़दमों से मेरे पास आ रही थी। उसकी तारीफ़ में मैं कुछ सोच पाऊं कि वो मेरे बिलकुल नज़दीक आ चुकी थी। उसने अपना हाथ हवा में हिलाया और कहा “हाय समीर।”
मैंने भी जवाब दिया “हाय ऋचा।”
वो थोड़ा हंसने लगी और बोली “अरे मैं ऋचा नही। वो मेरी फ़्रेंड ऋचा है। उसको शर्म आ रही थी तो मैं बुलाने आ गयी।” उसने अपना हाथ गली के दूसरे छोर पर ऋचा का पता बताते हुए कहा।
“चलो, बस मुझे ही शर्म नही आ रही।” थोड़े सुकून की सांस ली मैंने।
नज़दीक जाने पर मैंने ऋचा को देखा। बिलकुल साधारण सी लड़की। बहुत नही, पर ख़ूबसूरत। जिसने बालों में लाल रंग का रिबन बांध रखा था और उसने अब तक स्कूल का यूनिफार्म पहन रखा था। उसकी आँखें काजल की चारदीवारी से बाहर आकर मुझे ताके जा रहीं थीं। हाय- हेल्लो के बाद ऋचा की दो दोस्त प्रियंका और निधि हमारे आगे चलने लगीं और हम दोनों पीछे। मानो Z-लेवल सिक्योरिटी मिली हो हम को मोहल्ले के लोगों से।
साथ तो चल रहे थे हम, लेकिन बात क्या करें समझ नही आ रहा था। बार बार हंस के अंदर से आ रहे सवाल की ऑथेंटिसिटी चेक करके वापस लौटा देते उसको। मैं तो पैदाइशी फटटू हूँ और फटटू ही रहूंगा। और आखिर में उसी ने पूछा,
“तुम दिन भर पढ़ते रहते हो क्या ?” अपनी आँखें ज़मीन से ऊपर लाकर उसने सवाल किया।
“नहीं, रेडियो पर गाना भी सुनते है और क्रिकेट भी देखते है कभी कभी।” पढ़ाई की कोई बात करे, पसंद नही मुझे। लेकिन बिचारी करे भी तो क्या बात, इंडिया के इलेक्शन पर?
“और तुम?” मैंने वही सवाल दाग़ दिया वापस। चोरी करने में शुरू से ही तेज़ था मैं।
“हम डांस सीखते हैं, कैरमबोर्ड खेलते हैं और कभी कभी हवा न चले तो भैया के साथ बैडमिंटन भी।” उसने धीमे से कहा।
“ऋचा, घर आ गया है तेरा क़रीब।” ऋचा के दोस्तों, यानी हमारे सिक्योरिटी गार्ड्स ने ख़तरे का ऐलान किया।
“अच्छा सुनो। कल चाय पीने आओगे टफरी के पास? कल मैं अकेले आऊँगी पक्का।” वो बिना मेरा जवाब लिए तेज़ क़दमों से सड़क के किनारे बने एक घर में घुस गई। जाते जाते पलटी, और हंस दी हल्के से। मेरी नयी-नयी बनी दुनिया में इतने भूचाल आ गए थे एक साथ कि मुझे आराम से बैठ कर सोचने की जरुरत थी।
जैसे ही घर पंहुचा, मम्मी के शक भरे तीर मुझ पर बरसने लगे। लेकिन आज मैं कहीं और ही था। शायद उस काजल के ओट में, या फिर उसने जो लाल धागा बांध रखा था हाथ में, वही फँस गया था शायद। कल चाय, ये सोच कर मेरा आज भी किसी तरह ही कटने वाला था।

क्रमशः

 

 

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