इंतज़ार | An Endless Journey Begins

इंतज़ार | An Endless Journey Begins

 

सर्द हवाओं के बीच कॉफ़ी शॉप में बैठा मैं, बस इंतज़ार में था। ठिठुरन, जिसने हर किसी को कैद कर लिया था, मुझे छू भी ना पाई थी। महीना भी दिसंबर का था और शहर भी नैनीताल, पर फिर भी ठण्ड हमसे कोसों दूर थी।

समय ने भी शायद ठण्ड से बचने के लिये तेज़ी से बीतना शुरू किया और घड़ी ने कांपते हूये तुरंत छ: बजा दिये। तभी दिल ने ज़ोरों से धड़कना शुरू किया, माथे पर पसीना मानो ठण्ड पर हँसता हुआ बेधड़क बह रहा था और आँखें तो बस अपना कोना संभाले एक कोने को निहारे जा रही थीं। अचानक वो सामने आकर थम गयी।

वो आज भी बिलकुल वैसी सी थी जैसी तब थी। काजल की गोद में खेलती आँखें, आवारा सी उसकी ज़ुल्फें जिन्हें मोहब्बत थी हवाओं से, जब देखो हवा संग इधर उधर उड़ती फिरती; वही शरारती चेहरा जो खुश हो तो खुदा भुला दे और ना हो तो खुदा रुला दे। सब कुछ बिलकुल वैसा ही था जैसे पहले था, बिलकुल वैसा; बस तब हम साथ थे।

और आज छ: सालों बाद एक बार फिर हम साथ हैं। तब कभी मुँह से यूँही निकल गया था कि हम कहीं भी हों पर साल के इस दिन नैनीताल ज़रूर आयेंगे और ठीक इसी वक़्त इसी जगह इंतज़ार करेंगे एक दूसरे का।

पाँच साल यूँही गुज़र गये ठण्ड को मात देते हुये पर वो नहीं आई। इस साल शायद ठण्ड भी कुछ ज़्यादा थी और इससे पहले कि ठिठुरन हमें कैद करती खुद में, वो आ गयी, पूरे छ: साल बाद।

“आखिर याद आ गया तुमको? कहीं गलती से तो नहीं आ गयी?” हमने भी नाराज़गी को अपनी बातों में लपेटते हुये, मुस्कुराते हुये कह दिया। अब ख़ुशी तो हमारे अंदर इतनी थी कि मानो नैनीताल की फिज़ायें गुलाम हों हमारी, पर चेहरे के रास्ते से हमने उसको आने नहीं दिया।

“गलती से ही आ गयी थी, वो तो तुम दिख गये तो सोचा पूछ लूँ हालचाल तुम्हारे।” तेवर में कोई कमी ना थी उसके और इसी अदा के कायल थे हम। इतना बोलने के बाद उसने अपनी हवाओं की मोहब्बत में पागल ज़ुल्फों को अपने चेहरे से हटाया।

“वाह! बात तुमने ही बोली थी और तुम ही नहीं आई और जवाब तो देखो, जैसे हम ही भूल गये हों बात को” हमने भी अपनी तरफ से कोई कसर ना छोड़ी।

“अब लड़ना है?” उसने अपनी भरी हुई आँखों को हमारी पलकों पर रखते हुये कहा और हमेशा की तरह हमारी आँखें फिर डर गयीं। हवायें अपनी ज़ुल्फों को देख और तेज़ी से बहने लगीं और फिर कुछ देर सिर्फ उन्होंने ही बातें कीं। माल रोड पर भी अब कुछ ही लोग रह गये थे, नैनीताल खुद की ख़ूबसूरती पर इठलाता हुआ अलग ही जगमगा रहा था पर झील खामोश थी, बिल्कुल हम दोनों की तरह।

“सुनो ना,” उसने ख़ामोशी को तोड़ते हुये कहा, “तुम्हें लगता था, मैं आउंगी?”

मैंने उसी ख़ामोशी को वापस जोड़ते हुये अपना आगे का सफ़र जारी रखा।

“बोलोगे?” उसने मेरे हाथों को अपनी जगह से झटकते हुये वापस पूछा, यह आदत भी उसकी वही पुरानी है।

“तुम्हें लगता था, मैं आउंगी?”

मेरी धुंधली आँखों ने एक झलक उसकी तरफ देखा और जुबां से यह देखा ना गया, उसने तुरंत अल्फाज़ों को खुद से जुदा किया।

“ये छत देख रही हो ना तुम? इसका रंग पहले लाल था, अभी पिछले ही साल इन्होंने हरा करवाया है। यह कॉफ़ी मग अभी दो साल पहले ही स्टार्ट हुये हैं, पहले ये कॉफ़ी कप में सर्व करते थे; और ये कार्पेट आज से चार साल पहले फूलों वाली हुआ करती थी। हाँ, ये पेंटिंग पिछले पाँच सालों से ठीक इसी जगह पर लगी है, इससे पूछ लो, यह भी बता देगी।”

मैंने अपनी बात खत्म की और वह एक आंसू जो बहुत देर से किसी तरह अपने पैर जमाये, उसकी आँखों पर बैठा हुआ था, अचानक फिसल गया। ये हमें गवारा ना था, इससे पहले कि हम अपने सच की माफ़ी मांगते, उसकी ज़ुबां ने फिर दस्तक दी।

“क्यों?”

अब इस बात का जवाब तो हम बरसों से देते आ रहे हैं पर शायद उन्होंने ही ना मानने की ठान रखी है, पर जवाब तो ज़रूरी है।

“वो क्या है कि आदत, जानती हो तुम, बड़ी बुरी चीज़ होती है और हमें तो बचपन से ही बुरी आदतों का शौक रहा है, तो बस वही बुरी आदत…”

“बुरी आदतें अक्सर छूट जाया करती हैं।”

“आदतें तो अच्छी छूटती हैं, क्योंकि बुरी आदतों से तो दिल लगा होता है, और जिनसे दिल लगा होता है उन्हें भुलाया नहीं जाता।”

अब उन्हें कैसे बतायें कि वही तो है आदत हमारी, बुरी भी और अच्छी भी। ख़ैर, इससे पहले कि हम कोई सवाल बुनते, उन्होंने वापस बुन दिया।

“वाॅक पर चलें, कॉफ़ी के साथ?”

अब ये कॉफ़ी हम दोनों के बीच कई बार आई थी पर कभी मिलाया भी इसने ही था तो कोई गम नहीं।

अब झील का किनारा था और हम दोनों, कॉफ़ी को भी हम कबका पीछे छोड़ आये थे। ना ही किसी में सवाल बुनने की हिम्मत थी और ना ही कोई जवाब था जो मचल रहा हो बाहर आने को। एक दूसरे से खूब सारी बातें करते हुये खामोश हम दोनों ने चलना शुरू किया। हवायें अब भी अपनी मोहब्बत लुटा रही थीं, चाँदनी झील पर लेटी आराम फ़रमा रही थी, ठण्ड ठिठुरन बढ़ा रही थी और रोशनी बस खिलखिला रही थी कि तभी उसके हाथों ने चुपके से मेरे हाथों से दोस्ती कर ली और मेरा दिल, दिल ही दिल में गुनगुना उठा…

”यह क्या बात है आज की चाँदनी में,
कि हम खो गये प्यार की रागिनी में।
यह बाँहों में बाँहें, यह बहकी निगाहें,
लो आने लगा ज़िन्दगी का मज़ा।

ये रातें, ये मौसम
नदी का किनारा, ये चंचल हवा।
कहा दो दिलों ने कि मिलकर कभी हम, ना होंगे जुदा।

ये रातें, ये मौसम
नदी का किनारा, ये चंचल हवा।

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