पहला प्यार | First Love

*पहला प्यार : भाग एक*
"Introduce yourself."
क्लास में आये नए और थोड़े मासूम चेहरे को देख मुरारी सर ने अंग्रेज़ी में रौब जमाते हुए कहा।
"I am Sameer saxena. I have joined this school today to pursue my high school studies." मैंने बड़ी ही साफगोई और नादानी से जवाब दे दिया। पूरी क्लास, जो एक और ड्रामे का इंतज़ार कर रहा थी, मेरे अंग्रेज़ी में दिए हुए जवाब से सन्न हो गई। मानो सचिन का विकेट गिरा हो वर्ल्ड कप फाइनल में और ये सब स्टेडियम में बैठे हैं, चुप।
मुरारी सर की नज़रें भी गिरगिट की भांति रंग बदल रही थीं। पहले व्यंग्य, फिर विस्मित और क्रोधित से होते हुए अब वो मुझसे हिंदी में बात करने लगे। ऐसे शुरू हुआ मेरे स्कूल का पहला दिन, जहाँ एडमिशन के लिए मैंने अपनी ज़िन्दगी के 14 साल काट लिए थे।
बिहार बोर्ड का स्कूल, जहाँ इंग्लिश के टीचर ढंग से इंग्लिश नहीं बोल पाते, मेरी इस लाइन ने मेरा पहला प्रभाव जमा दिया था। लड़कियाँ होती क्लास में तो मैं अपनी पहली किला फतह पर बहुत खुश होता, मगर बस बॉयज़ स्कूल होने का नुक्सान हो गया हमको।
मेरे पिताजी भी एक स्कूल चलाते हैं। घर ही समझो स्कूल था मेरा। 
छत के ऊपर घर और नीचे स्कूल। ना वो बचपन की मस्तियाँ और ना ही वो बदमाशियां करने को मिलीं। अब आपके स्कूल में तो प्रिंसिपल धमकी देता होगा की पेरेंट्स को बुला देंगे। लेकिन यहाँ क्या बुलाना, बस अपना रूप बदल के धुनाई शुरू। शायद ये उनका बलप्रभाव ही था जिससे मेरे अंदर के बदमाशी के कीड़े थोड़े सुप्त तो हो गए, लेकिन मरे नहीं थे।
हमारा स्कूल आंठवी तक ही था, तो उसके बाद मेरा दाखिला हुआ इस नए स्कूल में। पढाई तो कहीं भी हो जाती लेकिन ये जो 7 km दूर स्कूल था मेरा, उसमें आने जाने का सफ़र और फिर पूरे दिन बिना किसी निगरानी के, समझो जवानी के दर्शन हो गए थे अब तो। पिताजी की सख्त हिदायत थी कि साइकिल नहीं चलानी है, गिरोगे तो फिर भी ठीक है, लेकिन अगर किसी पर गिरा दोगे तो? और इस तरह उनकी इज्ज़त के चक्कर में हमारा बचपन तो चला ही गया था, जवानी ना चली जाये ये फिक्र सताती थी हमको। ये नया स्कूल बस स्कूल नहीं था, मेरे आज़ादी का मुल्क था, मेरी बदमाशियों का अड्डा, मेरी जवानी के फूल यहीं महकते थे। घर पर तो वापस मैं वही, सुम्मू था उनका, बच्चा, बिलकुल साफ़ सुथरा।
अब जो पापा ने साइकिल ना ले जाने का आदेश पारित कर दिया था, तो कुछ तो उपाय लगाना बनता था। मुकेश मेरा एक दोस्त उसी स्कूल में पढ़ता था। मुकेश थोड़ा भोंदू था लेकिन भगवान ने शरीर दिया था जो पौना शतक मार चुका था और अब तोंद शर्ट के बटन को चीर के बाहर आ कर खुली हवा में सांस लेने को बेताब रहती थी।
उससे एक दिन मैंने पूछा, "अच्छा मुकेश, एक काम करते हैं , स्कूल से आते वक़्त तुम मुझे साइकल के पीछे बिठा लेना और जाते वक़्त मैं बिठा लूंगा।" मैंने आशा भरा एक मुट्ठी चारा फेंका।
"अरे नहीं, क्या बात करते हो, मैं ले चलूंगा, आते जाते, बस.... " उसकी अटकी बात मेरी योजना की सफलता का प्रमाण दे चुकी थी।
यही करार हुआ की मैं उसको अपने नोट्स दिया करूँगा और वो मेरा ड्राइवर बनेगा। मेरे नोट्स की कीमत इतनी हो सकती है, मैंने पहली बार उस दिन जाना था।
***
उम्मीद के मुताबिक, मैंने जल्द ही स्कूल में पढ़ाकू और शरीफ बच्चे का दर्जा हासिल कर लिया। मुकेश जैसे बच्चे कई थे हमारे यहाँ, तो उनके बीच क्रेज़ हो गया हमारा। मुझसे पहले क्लास के सबसे समझदार स्टूडेंट्स थे नितेश और उमेश। नितेश की राइटिंग डॉक्टर जैसी थी और उमेश कभी नोट्स लिखता नहीं था, तो मेरे प्रोडक्ट की डिमांड बस नेचुरल सिलेक्शन समझें, लेकिन मेरे अंदर का हरामीपना अपने जैसे लोगों को ढूंढने में लगा था, जाने कब ये तलाश पूरी हो।
एक दिन मुकेश के पेट में दर्द हुआ तो मैं स्कूल की तरफ अकेले ही चल दिया और रास्ते में दीपक मिल गया, नोट्स से बना एक और दोस्त। उसने पूछा कि मुझे लिफ्ट चाहिए क्या और मैंने भी कुछ सोचे बिना उसके कैरियर पर अपना वज़न टिका दिया।
"तुमको पता है, तुम्हारे चर्चे पूरे स्कूल में हैं आज कल तो।" दीपक ने साइकिल की पैडल पर ज़ोर डालते हुए कहा।
"अरे, लड़कों में अपना क्रेज़ बनाकर क्या हलवा पूरी खाऊंगा उसका।" मैंने अपने अंदर पल रही उदासी को आज बयान कर दिया।
"हाहा, तुम्हें पता नहीं कि हमारे यहाँ गर्ल्स विंग भी है।" दीपक मेरी तरफ मुड़कर बोला।
"सच में ?" मेरी अचानक से बड़ी हुई आँखें मेरी ख़ुशी झलका रही थी।
"और वहाँ भी बहुत चर्चा है तुम्हारा।" उसने मेरे "सच में" से निकलते हुए अपनी अधूरी लाइन पूरी की।
"मज़े मत लो यार, हम देखे नहीं किसी को, हमको कोई देखि नहीं तो ई सब कैसे हो सकता है।" मैंने अपने भाव सिकुड़ा के कहा।
"अरे वो रामनंदन सर है ना, मैथ्स वाले। उनके कोचिंग में पढ़ते हैं हम। कल सर बोल रहे थे, 'क्या होशियार लड़का है।' तो सब लड़की भी बोल रही थीं।" उसकी बातों ने धड़कने बढ़ा दी थी मेरी।
स्कूल आ गया था लेकिन मेरा मन ना तो इस साइकिल के कैरियर से उतरने का था और ना ही वापस आने का, उस दुनिया से जो दीपक ने बना दी थी मेरी रूखी ज़िन्दगी में।
जिनके कदम लड़कियों की दुनिया में कई बार फिसल चुके थे। ऐसे अपने कई प्रतिभावान दोस्तों से बात करके पता चला कि करीब 200 मीटर दूर एक बिल्डिंग में गर्ल्स विंग है। दीपक की बात पूरी झूठी भी नहीं थी, सोचा हमने।
अगले दिन क्लास में दीपक मेरे पास आया और बोला, "भाई, वो इतिहास का नोट्स देगा क्या ?"
"मैं तो अपना पैंट उतार के दे दूँ।" सोचा मैंने मन ही मन और अपना नोटबुक बढ़ा दिया उसकी तरफ।
अगले दिन मैंने जब दीपक से अपना नोट्स वापस माँगा तो उसने एक षड्यंत्रकारी मुस्कान दी और बोला, "एक पेपर है उसके भीतर, अकेले में पढ़ना। फिर कल बात करते है।"
मेरे जज़्बात आज भ्रमित हो गये थे। खुश होऊं या डर जाऊं, परेशान रहूँ या नाचूँ ख़ुशी से। क्या पन्ना love letter है या कोई धमकी दे रहा है। मैंने परेशानी में मुकेश को बुलाया और उसके कैरियर पर बैठ गया। खोया हुआ, गुमसुम।

क्रमशः

 

 

 

 

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