सपने भाग-1

“जी आप पिछले कुछ दिन से दिखीं नहीं। कहीं गयीं थी क्या ?” पीछे से किसी अजनबी की आवाज़ सुन कर सुधा जी चौंक गयी। मुड़कर देख तो सफ़ेद पजामे-कुर्ते में एक सज्जन उनके बग़ल में बेंच पर बैठते हुए दिखे।
“जी नहीं कहीं गयी नहीं थी। बच्चें छुट्टियाँ बिताने आ गये थे तो उन्ही के साथ व्यस्त हो गई थी।” ख़ुद को थोड़ा और बेंच के दूसरे कोने पर शिफ़्ट करतीं हुईं बोली।
“ओह! वैसे आपको हर रोज़ शाम को यहाँ टहलते देखता था, आप नहीं दिखीं इसलिए पूछ बैठा।” बात आगे बढ़ाते हुए वो सज्जन बोले।
” जी, कोई बात नहीं। मेरा टहल कर हो गया है अब चलती हूँ।” कहते हुए सुधा जी उठ खड़ी हुईं तो वो सज्जन भी साथ हो लिए। सुधा जी को ये असहज लगा मगर कुछ बोली नहीं, अपना चलती रहीं। कोने से जो वो मुड़ने हीं वाली थी कि, सज्जन बोल पड़े, ” मेरा नाम अरुण है, यहीं बाजु वाली सोसाइटी में रहता हूँ, अगर आप के पास थोड़ा वक़्त है तो चलिए न चाय पी लेते हैं, शाम वाली।”
सुधा जी को अब और अजीब लगा वो मना करने हीं वाली थी कि अरुण बोल पड़े, ” जानता हूँ बच्चे चले गये तो आप उदास होंगी, थोड़ी देर बातें होंगी तो बेहतर लगेगा।”
न चाहते हुए भी सुधा जी दुकान के सामने लगी कुर्सी पर बैठ गई। इधर-उधर की बातें होने लगी। बातों-बातों में पता चला की अरुण जी रिटायर्ड बैंक मैनेजर हैं और उनके बच्चे विदेश में रहते हैं। पत्नी तीन साल पहले साथ छोड़ कर जा चुकी हैं।
जिस साफ़गोई से अरुण जी अपने बारे में हर बात बता रहें थे, सुधा जी को वो अच्छा लग रहा था। सुधा जी ने भी अपने बारे में एकाध बात बतायी, मगर पति के बारे में चुप रहीं। अरुण जी ने ज़्यादा नहीं कुरेदा। चाय ख़त्म कर के दोनो अपने-अपने घर चले गये।
फिर ये साथ में चाय और टहलने का सिलसिला शुरू हो गया। सुधा जी को अरुण जी हर बात गुदगुदा देती थी। बातों-बातों में जो अरुण जी, ग़ालिब, फ़ैज़, फ़राज़ की ग़ज़लें और शेर बोलते थे, सुधा जी को वो सबसे ज़्यादा पसंद आता था।
अब सुधा जी भी खुल कर उन से बातें करने लगीं थी। जो उनके मन का सूनापन था वो अरुण जी की बातें उनको भरने लगीं थी। जीवन भर जिस साथ को वो तरसतीं रहीं वो अब जा कर उम्र के इस पड़ाव पर मिला।
सुधा जी अब ख़ुद का और ख़्याल रखने लगी थी। पहले सिर्फ़ सफ़ेद कुर्ते में जो टहलने आतीं थी, अब किसी दिन गुलाबी तो कभी हल्के हरे रंग के कुर्ते नज़र आने लगे थे। बातों-बातों में एक दिन अरुण जी ने अपना पसंदीदा रंग, आसमानी बोल दिया तो, दो आसमानी कुर्ते ले आयी बाज़ार से।
उस दिन टहल कर दोनो बैठे थे कि, अरुण जी ने पूछ लिया कि “आप दूसरी शादी के बारे में क्या सोचतीं हैं ?”
सुधा जी सन्नाटे में चली गई। काफ़ी देर चुप रहीं और फिर बिना चाय पीए घर चली गई। कई दिनो तक टहलने भी नहीं आयीं। अरुण जी ने कॉल भी किया मगर कोई जवाब नहीं मिला।
अरुण जी ने भी अब पार्क आना छोड़ दिया। महीनों गुज़र गए। बाज़ार, सब्ज़ी मंडी कहीं भी उन्हें सुधा जी नहीं दिखी। ख़ुद को बहुत कोसा, कितनी हीं गालियाँ दीं, मन ही मन कुढ़ते रहें, ” आख़िर पहले तो कम-से-कम दोस्त तो थे। रोज़ मुलाक़ात तो होती थी। और ज़्यादा पाने की चाहत में जो था वो भी गँवा दिया।”
एक दिन दोपहर में खाना कर सोने की कोशिश कर रहें थे कि अचानक से डोर-बेल बजी। अभी कौन आया होगा, यही सोचते हुए दरवाज़ा खोला तो देखा, सुधा जी आसमानी साड़ी में सामने खड़ी थी।
उनको यूँ सामने पा कर अवाक् हो गये। थोड़ी देर बाद होश आया तो सुधा जी को अंदर आने को कहा।
दोनो चुप-चाप काफ़ी देर तक बैठें रहें। फिर अचानक सुधा जी बोल पड़ी,
“आप मेरे लिए जैसी सोच रखते हैं मैं भी वही सोचतीं हूँ। आप से मिलने के बाद मैंने अकेलेपन को जाते देखा है। आपके साथ जितना समय बिताती हूँ वहीं वो समय होता है, जिसमें मैं ख़ुद के साथ होती हूँ।
मगर उस दिन यूँ अचानक आप ने शादी का विषय निकाल दिया तो मुझे कुछ समझ नहीं आया। घर जा कर काफ़ी देर सोचतीं रहीं फिर एक दिन हिम्मत कर के बच्चों को फ़ोन किया और सब बातें बता दी।” इतना कह कर वो फिर चुप हो गई।
अरुण जी भी चुप-चाप उनके दुबारा बोलने का इंतज़ार करते रहें। काफ़ी देर ख़ामोशी पसरीं रहीं फिर वो रसोई में जा कर लाल-चाय बना लायें।
सुधा जी ने चाय की पहली चुस्की ली और बोला, ” आप जानते हैं मेरे पति बरसों पहले मेरी छोटी बहन के साथ शादी कर के दिल्ली में शिफ़्ट हो गए। मैं अकेली ने बेटा-बेटी को पढ़ा लिखा कर, इस मुक़ाम पर पहुँचाया है कि आज उन्हें किसी बात की कमी नहीं है।
उन्होंने ने मुझे मेहनत करते हुए देखा है, ज़माने से जूझते देखा है। बेटी मेरी बड़ी है, तो उसने कितने हीं रातों को मेरी आँसुओं को पोछा है। मैंने भी अपनी पूरी ज़िंदगी इन बच्चों के लिए निकाल दी और मुझे कोई मलाल भी नहीं है।
मगर आज जब मैंने अपनी ख़ुशी, अपनी ज़िंदगी के बारे में पहली बार सोचा तो वो ज़माने के साथ जा कर खड़े हो गये। उन्होंने उस पिता से रिश्ता जोड़ लिया जिसने कभी उनकी कोई क़द्र नहीं की।
आप जानते हैं, मेरी बेटी कल मुझे फ़ोन कर के क्या बोली ?”
अपने धुन में बोले जा रही थी सुधा जी, ” कहती है पापा आपको इसलिए छोड़ दिए क्यूँकि आप शुरू से ही ऐसी थी। आपका अफ़ेयर अपने ऑफ़िस के बॉस के साथ था। आपको माँ कहने में शर्म आती है।” कहते-कहते वो फ़फक कर रो पड़ी।
अरुण जी पहले कुछ देर कुछ सोचते रहें और फिर उठ कर सुधा जी के पास गए और गले से लगा लिया। वो जो अकेलेपन और दर्द का सैलाब न जाने कितने सालों से अंदर भरा था, सुधा जी ने आँखों से बह जाने दिया।
घंटो यूँ ही उनके सीने से लगी रोतीं रहीं और अपने अधूरे ख़्वाब, वो सारे अरमान जिसे सोच कर वो अपने पति के घर आयीं थी बताती चली गयीं।
अरुण जी जैसे किसी छोटे बच्चे की सारी बातें ग़ौर से सुनते हैं वैसे सुनते रहें। दोपहर से शाम कब हो गई पता हीं नहीं चला।
फिर देर रात दोनो साथ में टहलने निकले तो रास्ते में आइस-क्रीम के ठेला को जाते देख कर अरुण जी रुक गए और दो आइस-क्रीम ले आए और रोड के साइड में लगी बेंच पर दोनो बैठ कर आइस-क्रीम खाने लगें।
आइस-क्रीम ख़त्म कर के दोनो पार्क के अंदर चले गये। रात की रानी की ख़ुशबू पूरे पार्क को महकाए हुए थी। आसमान में पूरा चाँद निकल आया था। देर तक दोनो चलते रहें ख़ामोशी से।
फिर अचानक गेंदे के एक छोटे से फूल को अरुण जी तोड़ कर सुधा जी के बालों में खोंस दिया। सुधा जी अवाक् देखतीं रह गईं।
अरुण जी हमेशा की तरह पूरी ज़िंदादिली और अपने शायराने अन्दाज़ में बोल उठे,
“दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म कि शाम मगर शाम ही तो है”
और अब सुधा जी ने आगे बढ़कर अरुण जी का हाथ थाम लिया और उनके क़दम से क़दम मिलाती हुई एक नए मंज़िल की तरफ़ बढ़ने लगीं।
(कहानी जारी है..)

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