लम्हे | love-moments

लब तो दो ही थे पर बातें हज़ारों थीं । कुछ तो मेरी कहानी बाकी थी और कुछ उसे सुनानी बाकी थीं । वो महीनों इंतज़ार करती थी उन यादों को फिर से जीने के लिए जो उसकी ज़िन्दगी की खिड़की में अक्सर आया जाया करती थीं । इस नकली दुनिया में जीते-जीते जब मरने की ख्वाहिश होती थी तो उसकी बाँह पकड़ लेता था और उसे लेकर हमारी बनायीं दुनिया में लेकर चला जाता था । उस दुनिया में वो थी मैं था और वो सारी यादें थीं जो हमने इंस्टॉलेमेंट्स में जमा कर रखी थी । उन यादों की झाँकी में वो टेढ़े मेढ़े चेहरे थे , वो सेल्फी वाले दो पॉउटस का मिलना था , वो पाँचों उँगलियों का कैद होना था और न जाने कितने ऐसे हसीन पल थे जो ख़ास थे बस हम दोनों के लिए ।

तो उन गुनगुने पलों को फिर से जिलाने का मेरा बस एक ही तरीका था । एक शाम को जब मैं घर आता तो सबसे पहले उससे टीवी का रिमोट छीनता उसे आँखें बंद करने के लिए कहता और बिखरे हुए मोती की तरह उसे बटोर कर अपने हाँथों में उठा लेता । फिर बैडरूम में लेजाकर उस मोती को उसके सीप पे प्यार से रख देता । घर की सारी बत्तियां बंद कर बस एक मोमबत्ती जला देता । फिर उसे अपनी गोद में लिटाकर अपने संग ले चलता उन बीते लम्हों में जिनके बिना ज़िन्दगी अधूरी रह जाती हमारी ।

” सृष्टि तुम्हें याद है वो दिन जब हम पहली बार गले मिले थे ?”

“हाँ । अच्छे से याद है मुझे उस पल को कैसे भूल सकती हूँ पहली बार किसी अनजाने को इतने करीब से महसूस जो किया था मैंने ।”

” और कॉलोनी वाली आंटी आकर कैसे कह रही थी कि बेटा किसी पार्क में चले जाओ । यहाँ बच्चे खेलते हैं । याद है न ? ”

” हाँ बाबा याद है बहुत अच्छे से याद है और मुझे तो ये भी याद है कि कैसे काँप रहे थे तुम ।”

” अच्छा तुम तो जैसे बड़ी बुत बनी खड़ी थी । भूलो मत मुझसे कहीं ज्यादा तुम काँप रही थी ।”

” अब रहने भी दो पोल मत खुलवाओ अपनी । जब अपने गाल तुमहारे गालों से थोड़े छुआये थे मैंने तो उस दिन की दाँतों की कड़कड़ाहट अभी भी कानों में महसूस कर सकती हूँ मैं । ”

“अरे वो ! , वो तो सर्दी कितनी थी उस दिन । ठंड से काँप रहा था मैं तो , तुम्हारी वजह से नहीं ।”

“अच्छा ? तभी तुमने अपना मफलर निकाल दिया था इस ‘गर्म’ ठण्ड से बचने के लिए ।”

” हाँ ये तो है वो गर्म ठंड इतनी ठंडी थी कि पसीने छूट गए थे मेरे । वैसे सच बताऊं तो मैं एक थप्पड़ की आस बटोहे था । क्योंकि इतनी करीबी भी नहीं आयी थी हमारे बीच तब तक , लेकिन उस दिन तुम्हें उदास देख के न जाने कैसे मुझे ये एहसास हुआ कि तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें गले लगाऊँ । इसीलिये झट से गले लगा लिया था तुम्हें मैंने । ”

” यश , थैंक यू इस हालत में भी मेरा साथ देने के लिए । सच कहूँ तो मुझे लगा था तुम मुँह मोड़ लोगे मेरे उस एक्सीडेंट के बाद लेकिन पता नहीं क्यों तुमने उसे अपना हमकदम बनाया जिसके पैरों ने अपने कदमों का ही साथ छोड़ दिया था । ”

” देखो सृष्टि एक बात हमेशा याद रखना कि मैंने हमेशा तुमसे प्यार किया है न की तुम्हरी बॉडी से । इसीलिये तुमहारे किसी बॉडी के पार्ट का होना या न होना मेरे मन में तुम्हारे प्यार को कम नहीं कर सकता और यार एक बात बताओ कि हमारी ज़िन्दगी की गाड़ी का चलना ही तो ज़रूरी है न फिर क्या फर्क पड़ता है कि वो गाड़ी चार पहिया हो या दो पहिया ।”

” हाँ हाँ मेरे शेक्सपीयर , मान गयी तुम्हें कि तुमसे बातों में कोई नहीं जीत सकता और इन्हीं चिकनी चुपड़ी बातों से हीे तो फँसाया था तुमने मुझे वरना कहाँ मैं रूप की रानी और कहाँ तुम काला दरवाज़ा । ”

” अच्छा ! अभी दिखाता हूँ कि इस काले दरवाज़े के पीछे कौन कौन से काले इरादे छिपे हैं । ”

” अरे ! अरे ! देखो अब बदमाशी नहीं । बहुत रात हो गई है सो जाओ चुपचाप कल ऑफिस नहीं जाना क्या ? ”

” ऑफिस तो जाना है पर पहले इस रूप की रानी को काले दरवाज़े के पीछे कैद तो कर दूँ ।”

कभी-कभी कुछ अनचाहे पल भी आते हैं हमारी ज़िन्दगी में जो कुछ चीज़ें छीन लेते हैं हमसे पर साथ ही वही पल जीने की नई वज़ह भी दे जाते हैं । अब सृष्टि उन्हीं पलों में खुश रहती थी क्योंकि वो अच्छे से जानती थी कि उन यादों को ज़िन्दा करना अब उसके बस में नहीं था इसीलिये उसकी सृष्टि बस मैं था और मेरी सृष्टि बस मेरी सृष्टि।⁠⁠⁠⁠

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