ऑउट ऑफ द बॉक्स | ए होरर स्टोरी

ऑउट ऑफ द बॉक्स | ए होरर स्टोरी

“ऐसे नहीं चलेगा रुबीना। कुछ आउट ऑफ़ दा बॉक्स सोचो।”
“सर ये अलग है आप एक बार पढ़ो तो मैंने पूरी स्क्रिप्ट ही बदल दी है।”
“ऐसा करो, इस स्टोरी को मुझे मेल करो और दो स्टोरी लिखो जैसा पहले किसी ने भी नहीं लिखा या पढ़ा हो। मुझे अभी निकलना है, रिया का ‘गर्ल्स-नाईट’ है तो मुझे उसे छोड़ने जाना है।” कहते हुए आकाश केबिन से निकल गया। रुबीना चुप-चाप लैपटॉप लिए वही बैठी रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर आकाश को चाहिए क्या, कहाँ से क्या नया लिखे। वैसे भी देर हो चुकी थी बाकि के सब लोग जा चुके थे, बस एकाध क्युबिक्ल की लाइट ऑन थी तो वो भी अपना बैग लिए निकल गयी।
रास्ते में याद आया की दूध नहीं है तो कार्नर वाले दुकान पर कार रोक कर दूध और कुछ फल खरीदने लगी। इतने में एक अधेड़ उम्र की महिला उसकी तरफ बदहवाश भागती हुई आई जो बमुश्किल टकराते-टकराते बची रुबीना से। सब्ज़ी वाला भी अकचका कर खड़ा होते हुए बोला, “मैडम आप ठीक हो न ?”
“हाँ भैया।” खुद को और उस महिला सम्भालती हुई रुबीना बोली। उसने देखा उस औरत के बाल बिख़रे हुए थे, आँखों के नीचे चोट के निशान थे। देख कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी कैद से भागी है।
रुबीना खुद को शांत रखते हुए उस से उसका नाम पता सब पूछने लगी मगर वो सिर्फ रोती रही। रुबीना को समझ नहीं आ रहा था की क्या करे। उसे यूँ अकेली उस दुकान पर छोड़ कर जाना सही नहीं लग रहा था। आस-पास भी सिर्फ कुछ दुकानें थी जहाँ कोई और औरत भी नहीं थी। किसी अनहोनी को सोच कर मन कांप उठा। उसने सोचा की उसे शांत करवा कर वो पुलिस-स्टेशन ले जाएगी और पुलिस से मदद मांगेगी, यूँ उसे अकेली यहाँ नहीं छोड़ सकती।
वो अब भी रो रही थी लेकिन जैसे ही रुबीना ने चलने को कहा वो चुप-चाप उसके साथ कार की तरफ बढ़ने लगी। कार की पिछली सीट पर सारा सामान रखते हुए इशारे से रुबीना ने उसे फ्रंट सीट पर बैठने को बोला और कार स्टार्ट कर के पुलिस-स्टेशन की तरफ बढ़ने लगी। रुबीना ने उसे पानी पीने को दिया तो उसने थोड़ा पानी पीया फिर रुबीना को लगा अब वो उससे उसके बारे में पूछेगी तो शायद वो कुछ बताये।
उसने बड़े आराम से उससे उसके बारे में पूछा।

थोड़ी देर चुप रही फिर न जाने क्या सोचते हुए जैसे खुद से बातें करते हैं वैसे अपने-आप में कुछ बुदबुदाने लगी। रुबीना को अजीब लगा उसने बोला, “आप थोड़ा जोर से बोलिये न मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

मगर वो अपने धुन में फुसफुसाए जा रही थी। रुबीना को अब डर लगने लगा मगर डर को काबू करते हुए वो फिर उससे जोर से बोलने को कहा और साथ में ये भी बोला की, “आपको डरने की जरूरत नहीं है मैं आपको पुलिस-स्टेशन ले चल रही हूँ वो जरूर आपकी मदद करेंगे।”
“कोई मेरी मदद नहीं कर सकता। यहाँ कोई किसी औरत की मदद नहीं करता। तुम्हें क्या लगता है कि मैं थाने में नहीं गयी थी, मदद की गुहार लगाने मगर वहाँ भी दरिंदे बैठते हैं जो पैसे वालों की सुनते है औरतों की नहीं।”
“ओह। तो आप मुझे ही बताइये आपके साथ क्या हुआ था। मैं आपकी मदद कर पाऊँ शायद।”
रुबीना की ये बातें सुन कर वो जोर-जोर से हँसने लगी। रुबीना अब और डर गयी, उसे लगने लगा की उसने इस औरत को कार में बिठा कर गलती कर दी। वैसे भी माँ ने कितनी बार उसे समझाया था की कोई भी फैसला दिल से न ले, दिमाग का इस्तेमाल करे खास कर जब बात अजनबियों की हो मगर वो भी आदत से मज़बूर थी। उसे समझ नहीं आ रहा था की क्या करे, पुलिस-स्टेशन अब भी काफी दूर था। उसे यूँ बीच रास्ते में उतड़ने को भी नहीं कह सकती थी। यही सब सोच रही थी कि वो औरत फिर बोल पड़ी,
“तुम्हारे बॉस को कोई इंटरेस्टिंग कहानी चाहिए न।”
अब रुबीना इतनी ज़ोर से चौकी की उसके हाथ स्टेयरिंग पर से हट गए। अंदर की साँस अंदर और बाहर की बाहर रह गयी। वो पूछना चाह रही थी मगर उसकी आवाज़ अंदर घुट कर रह गयी। ब्रेक लगा कर गाड़ी को साइड में खड़ा कर दिया रुबीना ने।
“उससे पूछना की उसकी सौतेली माँ के साथ क्या हुआ था। क्या सच में पागल थी और सच में स्लेंडर फटने से उनकी मौत हुयी थी। जानती हो ये मर्द लोग हर तरह से औरतों को लूटते हैं, चाहे वो रिश्ते में माँ ही क्यों न हो। उसने मेरे साथ जानवरों से भी बदतर सलूक किया है। सौतेली ही सही माँ थी उसकी, पिता के गुजरने के बाद उसने जबरदस्ती किया मेरे साथ। महीनों मुझे भूखा, पीछे वाले कमरे में कैद रखा और जब एक दिन उसका मन भर गया तो उसने ज़िंदा जला दिया मुझे। समाज में पहले से ही उसने अफवाह फैला राखी थी कि मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ तो लोगों ने भी आसानी से ये मान लिया।”
“नहीं आप ये सब झूठ बोल रहीं हैं और मैं नहीं डरती इन बनावटी कहानियों से। आप अभी के अभी उतर जाइये इस कार से।” कहते हुए रुबीना ने दरवाजा खोल दिया। वो बिना कुछ कहे कार से उतर गयी।
रुबीना जैसे-तैसे कार स्टार्ट करके वहाँ से आगे बढ़ी। रियर मिरर में देखा तो वो वही खड़ी थी। थोड़ा आगे बढ़ कर सोनाली को कॉल लगा कर उसे सारी कहानी फोन पर एक साँस में सुना डाली और फिर उसे घर आ जाने को भी कहा। सोनाली ने बोला की वो ऑफिस से निकल कर सीधे उसके घर पहुँच रही और किसी ने उसके साथ कोई मज़ाक किया होगा शायद बॉस ने ही कोई प्रैंक किया हो।
मगर रुबीना कैसे ड्राइव करके वो घर पहुंची ये उसे भी पता नहीं चला। लैपटॉप बैग लिए वो फैल्ट के लिफ्ट में पहुंची तो गार्ड से पूछा की सोनाली आ गयी है क्या? गॉर्ड ने नहीं में सर हिला दिया। अपने फ्लोर पर वो पहुंची तो देखा किचन का लाइट ऑन था, सोचा शायद आ गयी होगी सोनाली, ये गार्ड लोग इधर – उधर भटकते रहते हैं इनका क्या भरोशा। अब जा कर उसे जान में जान आयी, गहरी साँस लेते हुए लॉक खोल कर अंदर आयी औ लाइट न कर के सोफा पर सब सामान रख कर किचेन की तरफ बढ़ी,
“सोनाली क्या बताऊं आज तो मैं मर ही गयी थी। यार वो औरत सच में पागल…” अपनी बात पूरी कर पाती इससे पहले आधा जलता हुआ चेहरा लिए वही औरत उसकी तरफ मुड़ी और रुबीना वही धम्म से बेहोश हो कर गिर पड़ी। होश आया तो सोनाली सिरहाने में बैठी हुई थी। उसे देखते ही घबड़ा कर लिपटते हुए ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
मुश्किल से सोनाली ने शांत करवाया। धीरे-धीरे उसके बालों को सहलाती रही और वो फिर से वही सारी बातें दुहरा रही थी और किचन में जो हुआ वो बोल कर फिर से रोने लग गयी। सोनाली ने कहा, “तू रास्ते वाली बात से इतना डर गयी है इसलिए तुझे ऐसा महसूस हुआ। मैंने जा कर हर जगह देखा है कहीं कुछ भी नहीं है और जब मैं आई तो तू यही गद्दे पर सोती हुई मिली। चल उठ जा मुँह धो ले मैंने खाना मँगवा लिया है।”
मगर वो हिलने को भी तैयार नहीं थी। सोनाली जा कर खाना वही ले आयी दोनों वही बैठ कर खा कर सोने की कोशिश करने लगे।
कोई आधी रात को कुछ आवाज़ सुन कर रुबीना की आँख खुली पलट कर देखा तो सोनाली वहाँ नहीं थी, सोनाली-सोनाली आवाज़ लगाते हुए वो बेडरूम की तरफ धीरे-धीरे बढ़ने लगी। डर के मारे उसकी जान निकल रही थी, उसने झांक कर देखा तो वहाँ वो नहीं थी। जैसे ही मुड़ी तो सामने जलता हुआ चेहरा लिए वही औरत खड़ी थी, वो चीखना चाह रही थी मगर आवाज़ कहीं अंदर ही घुट के रह जा रही थी।
वो वहां से भागने की कोशिश करने लगी मगर वो भाग नहीं पा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने ज़ंज़ीर से उसके पैरों को जकड़ लिया हो और वो जलती हुई औरत धीरे-धीरे उसके तरफ बढ़ रही थी। अब छटपटाहट में रुबीना अपने पैर-हाथ जोर-जोर से पटकने लगी। उसकी छटपटाहट देख कर वो औरत फुसफुसाते हुए बोली,
“मैं भी ऐसे छटपटाती रही मगर मेरी किसी ने भी नहीं सुनी। सब ने मुझे पागल बोल कर दरकिनार कर दिया। आज तुमने भी तो मेरा यकीन नहीं किया बताओ नज़दीक आती मौत कैसी लग रही।” अपनी बात पूरी करके वो रुबीना को अपने पास खींच लिया। रुबीना जोर-जोर से चिल्लाये जा रही थी मगर उस से उस औरत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और उसका शिकंजा कसता ही चला गया। धीरे-धीरे कर के आग की लपटों ने रुबीना को अपने कब्ज़े में ले लिया। वो भागने की कोशिश अब भी कर रही थी की टकरा कर वही गिर पड़ी और उसकी नींद खुल गयी।
रुबीना चीख़ते हुए वो बॉस के केबिन से बाहर निकली उसे तो उसे महसूस हुआ की वो सपना देख रही थी। कहानी लिखते-लिखते वो न जाने कब वो वही सो गयी थी पता ही नहीं चला। बाहर निकल कर देखा तो सब लगभग जा चुके थे, वो भी निकल गयी। आधे रास्ते में रही होगी तो सोनाली का फोन आया की दूध लेते आये। घर से एक गली पहले वो कॉर्नर वाले दुकान पर जाने के लिए कार रोक ही रही थी की वही औरत बदहवाश दौड़ती हुई इस के कार से आ टकड़ाई। झटके से ये बाहर निकली तो देखा था।
“हूँ सच में मैं पागल हो जाउंगी इस नई कहानी के चक्कर में।” अपने आप में बोलते हुए दूध ले कर वो कार में बैठ गयी। रियर मिरर में चेक किया तो कहीं कुछ भी नहीं था। घर पहुंची तो देखा फ्लैट के लाइट्स ऑन थे।
अब जा कर उसकी जान में जान आई। खुश होते हुए सोनाली को आवाज़ लगाती अंदर घुसी तो उसने बोला कि वो किचन में है। भागती हुई रुबीना भी किचन में पहुंची अपनी सारी बातें बताने के लिए मगर किचन में सोनाली नहीं थी। वहाँ वही औरत अपने जले हुए चेहरे के साथ रुबीना का इंतज़ार कर रही थी!

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