घड़ी की सुईया और मै

मेरे सामने है एक घडी, जो उड़ रही है। जिसकी सुई एक सेकण्ड आगे बढ़ती है फिर एक सेकण्ड पीछे। क्लॉकवाइज और फिर ऐंटीक्लॉकवाइज़। उसी के साथ बढ़ती घटती है मेरी पुतलियां। समय आगे पीछे से मुझे घूर रहा है। शायद उसे शक है मुझ पर कि मैं इस वक़्त का नहीं। मेरी तलाशी ले रहा है, देख रहा है मेरी आँखों में और ढूंढ रहा है किसी पुरानी शताब्दी के फॉसिल्स। वो देख रहा है मेरी ज़बान में चिपके शब्द और उँगलियों में छिपी कविताएं। शायद मैं फेंक दिया गया हूँ किसी और टाइम से।

मैं आँखों से सुन रहा हूँ उस आगे पीछे होती हुई सुई को। जिसकी आवाज़ बाहर सड़क पर एक मजदूर की छेनी कुदाल की आवाज़ से सिंक्रोनाइज़्ड है। वो मज़दूर मुझे दीवार के उस पार से घूर रहा है और कान से निकाल के बीड़ी सुलगाता है। फिर फेंक देता है अपने औज़ार, और खोदता है नाखूनों से सड़कें। उसे हुक्म है तेल निकालने का। सवाल करने का नहीं। सड़क से मगर खून निकलता है। सड़कें डामर और मौरंग-गिट्टी से नहीं बनती। सड़कें बनती है लोगों के लाल लोथड़ों से, उनके, जो मर जाते है गड्ढो से लड़कर।

वो मज़दूर बार बार देखता है मुझे और खोदता है बेतहाशा, सड़क से कुछ बच्चे निकल रहे हैं नौनिहाल। ये पैदा हुए बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर के कपडे पहने हैं। कोई आला लगाए है कोई इंचीटेप लिए हुए है। ये हंस रहे हैं उस बच्चे पर जो नंगे बदन कुछ लिख रहा है एक कागज़ पर। इस बच्चे की शक्ल मेरे बचपन जैसी है। मेरी जैसी दाढ़ी मूंछ। इस बच्चे की कविता में ज़िक्र है एक पागल आदमी का जिसे पता चल गया है ब्रह्माण्ड का रहस्य| जिसने ढूंढ लिया है अश्वथामा का पता। जिसे पता है शिव का भगवान् और मसीह के पिता का गौत्र। इस पागल को पता लग गया है मरने के बाद क्या होगा उससे पहले क्या हुआ था।

वो सबको बताता है चीख चीख कर और कार में बैठे लोग उस पर हँसते हैं। वो सड़क पर लेट लेटकर लिखता है चॉक से। बच्चे उस पर पेशाब कर देते हैं। खींचते है उसके बाल और मारते हैं पत्थर। कुछ अच्छे लोग दे देते हैं उसे रात का जूठन और रसीद में कटा लेते हैं अपने बुरे काम। वो पागल थक चुका है और पर्ची में लिखकर ये रहस्य दौड़ रहा है। पर उसका एक कदम आगे पढता है अगला पीछे, बिलकुल मेरी घडी की सुई के सिंक्रोनाइज़ेशन में। वो रो रहा है ‘उस सेकण्ड’ जिसमे मैं हंस रहा हूँ। और वो हंस रहा है जिस सेकण्ड में, मैं उसमे रो रहा हूँ।

घडी की सुई की आवाज़ तेज़ होती जा रही है। उस पागल के क़दमों के पेस पर। वो बच्चा पन्ने पर बहुत तेज़ तेज़ लिख रहा है। और बाकी बच्चे भी उस पर बहुत तेज़ से हंस रहे हैं अब मज़दूर के नाखून भी तेज़ चल रहे है। घडी के कांटे उखड रहे हैं। और अब कांच तोड़कर बस निकलने वाले हैं।

अब सन्नाटा है। बाहर कुदाल नहीं चल रही। मैं बाहर जाकर देखता हूँ। उस नंगे बच्चे की उंगलियां और ज़बान बाकी बच्चों ने खा ली है। उसकी कविता के शब्द हवा में उड़ रहें है। और उसी के साथ वो पागल और उसकी पर्ची भी पिक्सल बाई पिक्सल गायब होती जा रही है। और मेरे हाथ पैर भी धीरे धीरे सफ़ेद धुवें में बदल रहे हैं। मैं अंदर देखता हूँ घडी की सुई अब फिर से क्लॉकवाइज़ चल रही है।

अब कोई कविता नहीं लिखी जा रही अब दुनिया में सब ठीक है।

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