menstruation cycle | Think differently

“वो अपवित्र हो जाती है, इसलिए उसे घर में नहीं रहना होता। बाहर बने उस झोपडी में रहना होता है चार दिन के लिए।”
“पूजा कैसे करेगी। भगवान जी छुआ नहीं जायेगें।”
“उसके हाथ का बना खाना घर के मर्द नहीं खा पाएंगे, काहे से की उसका “उ वाला” दिन चल रहा है।”
ये महज़ एक बानगी है। मैं जब भी कुछ ऐसा सुनती हूँ या पढ़ती हूँ तो सिर पीट लेने का मन होता है। आज अभी थोड़ी देर पहले न्यूज़ में देखा, नेपाल में एक पंद्रह साल की लड़की की मौत ‘मासिक-धर्म’ के दौरान हो गया। क्योंकि वहां रिवाज़ है, जब लड़कियां-औरतें अपने पीरियड्स से गुज़र रही होती है, तो उन्हें घर से बाहर बने ‘chhaupadi’ में रहना होता है। वो घर में आ-जा नहीं सकती। क्योंकि वो अपवित्र हो जाती है उन दिनों।
अब आप सोच रहे होंगे ये ‘chhaupadi’ क्या होता है। ये घर के बाहर बना एक छोटा सा कमरा होता है, जिसमें न तो ढंग की खिड़कियां लगी होती है न दरवाज़ा। सोने के लिए बिस्तर तक नहीं रहता। जमीन पर सोना होता है। इन दिनों खाना-पीना भी कम दिया जाता। दूध और फल से भी दूर रखा जाता है।
हाँ तो ऐसे में उस लड़की को, रात में वहां सोने के लिए भेज दिया। बेचारी को ठंढ़ लगी तो आग जलाया और उस कमरे में वेंटिलेशन का कोई जरिया नहीं था, तो घुट करके मर गयी। सुबह जब बाप आवाज़ दिया और कोई उत्तर नहीं मिला तो झांक कर देखा, वो भी इस “मासिक-धर्म’ की अपवित्रता की बलि चढ़ गयी थी।
खैर, ये कोई अकेले नेपाल की बात नहीं है। अपने देश में भी आप गांव की तरफ जाएँ तो, कमोबेश यही स्थिति देखने को मिलेगी। अभी भी ‘मासिक-धर्म’ को अपवित्रता से ही जोड़ा जाता है। आप न तो इसमें पूजा कर सकते हैं, न ही किसी भी शुभ कार्य में सम्मलित हो सकते हैं।
अभी भी गांव और कस्बों में लोग पीरियड आने को कोई ‘स्टिग्मा’ ही समझते हैं। माएँ खुल कर छोटी बच्चियों से बात नहीं करती। सनैटरी-पैड्स इतने महंगे हैं, जो वो उनके लिए खरीद नहीं सकती। ऐसे में बेचारी लड़कियों को किन-किन हालात से गुज़रना पड़ता होगा आप इसका अंदाज़ा लगा लीजिये।
ऊपर से वो इस दर्द को किसी से बाँट नहीं सकती। खुल कर बता नहीं सकती की उन्हें क्या महसूस हो रहा। जबकि सबको पता है की कितना दर्द होता है उन दिनों में। सबसे ज्यादा ख़्याल रखने की जरुरत तभी होती है और तभी उन्हें सबसे ज्यादा इग्नोर किया जाता है। घर में भी वो, पिता,भाई,चाचा आदि के सामने ये खुल कर नहीं कह सकती की क्या हो रहा।
ऐसा नहीं लगता की अब बहुत हो गया है। हमें इस पवित्रता – अपवित्रता के दायरे से उठ कर सोचना चाहिए। सरकार को भी गांव और कस्बों में रह रहें इन मासूम लड़कियों के लिए कुछ सोचना चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं तो स्कूल में, खुल कर टीनएजर बच्चों को इस विषय पर हर बात बतानी चाहिए और कम -से- कम कीमत पर ‘सनैटरी पैड’ मुहय्या करवाना चाहिएऔर उस सब से पहले माँओं को अपनी बच्चियों के लिए स्टैंड लेना चाहिए। सदियों पुराणी इस परम्परा को छोड़ कर बेटियों की खास देख-भल करनी चाहिए।
ख़ैर, जिसे जो करना होगा वो करेगा। हम सब भी अपने लेवल पर अपने आस-पास में थोड़ी बहुत जागरूकता तो फैला ही सकते हैं। जो और कुछ नहीं हो पाए तो कम-से-कम अपनी मेड या उन जैसी और भी औरतें हैं उन्हें बताएं इसके बारे में, समझाएं की कैसे उन्हें उन दिनों खुद की और अपने बच्चियों की केयर लेनी चाहिए।
बातचीत एक जरिया है, तो प्लीज बातें कीजिए और सिर्फ लड़कियों से नहीं, लड़कों से भी। उन्हें भी समझाइये और बताइये की ये सबसे कॉमन फेनोमिना है नेचर का। ज़रा सोच बदल कर देखिये, शायद उससे हमारा कल बदले।

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