करवाचौथ | The Valentine’s Day of India

“अरे ये नाश्ता कौन करेगा रे? कहाँ चल दिए, अभी तो टाइम है स्कूल में। चलो बैठो, नाश्ता फिनिश करो जल्दी से।”
“अरे मम्मी। बिलकुल मन नहीं कर रहा सच्ची में। आप कर लो ना नाश्ता, हमको आज जल्दी पहुँचना है स्कूल।”
“ये क्या बात हुई? और आज जल्दी क्यों स्कूल जाना है?”
“एक्स्ट्रा क्लास है न माताजी। जा रहे हम। और आज कोचिंग से देर में आएंगे। टाटा”
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“पूजा। ये टिफ़िन काहे छोड़े जा रही? और चाय भी ऐसे ही रखी है। देर हो जाएगी स्कूल को। खाओ फटाफट।”
“मम्मी हमारी तबियत ठीक नहीं लग रही। कुछ खाने का मन नहीं है। टिफ़िन नहीं लेके जायेंगे।”
“क्यों क्या हुआ तबियत को? कल तक तो ठीक थी। “
“अरे कुछ नहीं न। पेट में दर्द है बस।”
“तो स्कूल मत जाओ न। वैसे भी व्रत है मेरा, घर पर रहो। हम पापा को बोल देते हैं। अरे सुनिए तो….”
“अरे मम्मी आज बहुत इम्पोर्टेन्ट क्लास है। जाना ही होगा। और आज तो कोचिंग में भी देर हो जाएगी। सर बोले थे, एग्जाम पास में है, देर तक पढ़ाएंगे।”
“तुम और तुम्हारी पढाई। जाओ।”
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उस दिन दोनों समय से थोड़ा पहले पहुँच गए स्कूल। वो अपनी डेस्क से उसकी तरफ देखता रहा, और वो चुपचाप मुस्कुराती हुई दाँतों में पेन्सिल दबा ब्लैकबोर्ड निहारती रही।
उस शाम वो कोचिंग से थोड़ा धीमी चाल में वापस आ रही थी।
उस शाम वो साइकिल दोस्त को पकड़ाकर पैदल ही घर की तरफ बढ़ रहा था।
घर के नज़दीक पहुँच कर दोनों ही रुके। दोनों ने ही मुस्कुराते हुए एक दूसरे को देखा। दोनों के लिए वो एक नज़र चाँद के दीदार जैसी थी।
उसने आहिस्ता से आँखों से ही एक चलनी बनायी और उसका चेहरा देख लिया।
फिर उसने एकटक ताकते हुए उसे नज़रों से ही पानी पिलाकर व्रत तोड़वा दिया।
उसने ख़ामोशी से शिकायत की, “तुमको क्या ज़रुरत थी भूखे रहने की ? व्रत तो हमारा था।”
फिर उसने शरारत से जवाब दिया, “क्यों तुम्हारी लंबी उमर भी तो जरूरी है न। हम अकेले रहेंगे क्या।”
उसने थोड़ा शर्मा के नज़रें झुका लीं।
फिर उसने उसके चेहरे की सुर्ख़ियों को निगाहों में कैद कर लिया।
छोटे छोटे शहरों का पहला करवाचौथ ऐसे ही होता है शायद। है ना ?

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