किश्तों वाले रिश्ते | installment type relations

“भैया ये किश्त में कितने की पड़ेगी ?” शो रूम में खड़ी मारुती आल्टो की तरफ गर्दन से इशारा करते हुए विश्वनाथ जी ने कहा ।

“कितनी किश्तों में लेना चाहेंगे सर आप ?” सेल्स मैन ने कॉर्पोरेट मुस्कुराहट देते हुए पूँछा ।

“अरे ! महीने महीने वाला कर दीजिए तीन साल में तो भर ही दूँगा ।” विश्वनाथ जी ने मन ही मन अपनी कमाई का कैलकुलेशन करके बताया ।

” ठीक है सर । तो आपको सबकुछ मिला के ये करीबन 3.5 लाख के आस पास पड़ेगी ।” सेल्स मैन ने अपने कैलकुलेटर से जोड़ तोड़ निकाल कर बताया ।

” अच्छा ! तो कब तक मिल जायेगी ये ? ” थोड़ा हिचकिचाहट के साथ विश्वनाथ जी ने सेल्स मैन से पूँछा ।

” बस सर आप थोड़ी डाऊन पेमेंट कर के चाहे तो आज ही ले जा सकते हैं ।” सेल्समैन ने इस बार चेहरे पर सच्ची मुस्कुराहट देते हुये विश्वनाथ जी से कहा ।

“अरे नहीं-नहीं , अभी नहीं बिटिया की शादी अगले महीने है उसी टाइम ले जाएंगे । अभी तो आप बस बुक कर दीजिए इसे ।” विश्वनाथ जी को पता था कि उनके छोटे से घर में इसे रखने की जगह नहीं थी इसीलिये इन्कार करते हुए कहा ।

” ठीक है सर । आप इधर आ जाइये मैं सारे डाक्यूमेंट्स रेडी करवा देता हूँ आपके । ” सेल्समैन की मुस्कुराहट अब ख़ुशी में बदल चुकी थी ।

एक पुराने लैदर बैग से पैसे निकालकर विश्वनाथ जी ने बुकिंग के पैसे कैश काउंटर पर जमा करवा दिए ।

अब सेल्समैन ख़ुशी ख़ुशी विश्वनाथ जी को शोरूम के गेट तक छोड़ने गया पर उसकी आँखों की पलकों ने तब झपकना बंद कर दिया जब विश्वनाथ जी को उसने एक ऑटो रिक्शा खुद चलाकर ले जाते हुए देखा ।

अब जैसे ही पलट कर वो शोरूम के अंदर गया । शोरूम के मैनेजर ने उसे प्रोत्साहन देते हुए कहा –

” अरे ! वाह मेहता जी आज तो एक सेल हो ही गयी आपकी । चलिये बढ़िया है रिद्धिमा की स्कूटी की आखिरी किश्त का इंतेज़ाम आपने कर ही लिया ।”

|| आजकल अच्छा बाप वही कहलाता है जो बच्चों की खुशियों और ख्वाहिशों की किश्ते भर पाता है ||

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