Dear Zindagi : Beautiful life story of talented girl Kiara

‘डियर ज़िन्दगी'(Dear Zindagi)

‘डियर ज़िन्दगी'(Dear Zindagi) कहानी है एक खूबसूरत, टैलेंटेड, यंग और ‘बीमार’ लड़की काएरा की.आपको भी ऐसा ही लगता है?क्या कहा? हाँ?बस यहीं पर गच्चा खा गए आप.ये कहानी किसी एक काएरा की नहीं बल्कि मेट्रो सिटीज में जीवन जी रहे या यूँ कहें काट रहे अमूमन हर मध्यमवर्गीय यंग इंसान की कहानी है | हम सभी में कहीं न कहीं एक काएरा है.किसी में थोड़ी ज़्यादा तो किसी में थोड़ी कम,लेकिन है ज़रूर.हम सभी बीमार हैं और गज़ब तो ये है कि हमें पता भी नहीं कि हम बीमार हैं.दुष्यंत के लफ़्ज़ों में कहें तो ‘तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीन नहीं,कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं’.

अब सवाल ये उठता है कि हम बीमार क्यों हैं?ये बीमारी हमारी चॉइस नहीं कंपल्शन है.ये उस दौर कि बीमारी है जिसमे फ़ोन दिन-ब-दिन स्मार्ट होते जा रहे हैं और इंसान डम्ब.हम बीमार आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस कि खोज में नेचुरल इंटेलिजेंस से दूर होते जा रहे हैं.हमें इंसान नहीं रोबोट में दिलचस्पी है क्योंकि हम भी रोबोट हो चुके हैं.जी हाँ हम बन चुके हैं रोबोट.सुबह बेतहाशा हाँफते भागते रोबोट्स को पार्क में देखता हूँ तो समझ नहीं पाता कि वो रास्तों से पीछा छुड़ाने के लिए भाग रहे हैं या किसी इमेजिनरी मंज़िल की चाहत में.कान में इयरफोन ठूसे रोबोट्स की जमात को देखता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि क्या ये अपने भीतर के शोर को बाहरी शोर से दबा देना चाहते हैं?

फिर ये सोच के मुस्कुरा भी देता हूँ कि चलो कम से कम इन रोबोट्स में शोर अभी ज़िंदा है.हर कोई ‘आंखों में जलन’ और ‘सीने में तूफ़ान’ लिए भटक रहा है.हर कोई किसी तलाश में है.सभी उस चीज़ से नाखुश हैं जो उनके पास है.18 लाख के पैकेज वाले को 28 लाख वाले से कोफ़्त है.जिसके पास बाइक है उसे कार चाहिए.जिसके पास कार है उसे SUV चाहिए.सेम बात रिश्तों पर भी अप्लाई होती है.हमारे लिए इंसानों और i phone में कोई खास अंतर नहीं रह गया है.बेटर वर्जन मार्केट में आया नहीं की पुराना वाला कम्प्लीटली वर्थलेस. हम उस जनरेशन के बीमार लोग हैं जिन्हें बचपन में ही रॉ मटेरियल की तरह IIT /PMT आदि की फैक्ट्रीज को सप्लाई कर दिया जाता है.

अब इस फैक्ट्री से निकले प्रोडक्टस ,जो कि पारंपरिक रिश्तों (माँ,बाप,भाई,बहन) से नावाकिफ होते है,जब कंज्यूम होने को किसी मेट्रो सिटी में पहुँचते हैं तो अपने भीतर के इमोशनल वैक्यूम को एक्सपैंड होता देखते है .उनके भीतर का ‘सोशल एनिमलत्व’ उन्हें इस वैक्यूम को फिल करने के लिए फ़ोर्स करता है.और शुरू होती है एक अनंत खोज.एक रिश्ते की खोज.एक ऐसा रिश्ता जो हर की रिश्ते की भरपाई कर सके.एक ऐसा फरिश्ता जो माँ की तरह केयरिंग बाप की तरह रेस्पोंसिबल भाई/बहन की तरह फ्रेंडली हो.लेकिन हम ये भूल जाते है की पूरा शहर हमारे जैसे प्रोडक्ट्स से ही भरा पड़ा है. हम सभी ‘आधे-अधूरे’ हैं.अब इतनी सारी चाह है तो तो इन चाहतों को पूरा करने का दबाव भी होगा.सारी चाहतें पूरी हो ऐसा पॉसिबल तो है नहीं, अधूरी चाहतें टेंशन क्रिएट करती हैं और टेंशन धीरे-धीरे एक्यूमुलेट होकर डिप्रेशन में बदल जाता है.और हम बीमार हो जाते हैं.

लेकिन हम एक्सेप्ट नहीं करना चाहते कि हम बीमार हैं.हमें डर होता है कि कहीं दूसरा बीमार हमारी बीमारी का मजाक न उड़ा दे.तो बात ये है कि आप परवाह अपनी बीमारी की कीजिये न कि किसी दूसरे बीमार की.सीधे किसी DD माने किसी दिमाग के डॉक्टर के पास जाइये और बेहिचक इलाज कराइये.’डिअर ज़िन्दगी’ यही मेसेज देती है.अब सिर्फ ‘हंगामा खड़ा करना’ तो मेरा मकसद था नहीं.हालात बदलने की कोशिश भी कर लेते हैं.अगर आप पढ़ते-पढ़ते यहाँ तक पहुँच गए हैं तो इतना तो समझ ही गए होंगे कि ये बीमारी कॉमन है.हम जिस अर्बन सेटअप में रह रहे हैं और जिस कंपेटिटिव लाइफ स्टाइल को अपनाये हुए हैं उसमें इस बीमारी से अछूता रहना बहुत मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन हो ऐसा नहीं है.बस करना ये है कि कुछ छोटी-छोटी मगर मोटी बातों को अपने बिहैवियर का पार्ट बनाना है.

पैसों के साथ साथ रिश्ते भी कमाइए.माफ़ी माँगना सीखिये.माफ़ करना सीखिये.दूसरे के पॉइंट ऑफ़ व्यू से सोच के देखिये.लत नहीं शौक पालिए.इंसान बनिए रोबोट नहीं.बाकी तो आप समझदार हैं ही.

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